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सुधीर चौधरी के ₹15 करोड़ सालाना के रिपोर्टेड कॉन्ट्रैक्ट पर सवाल, लेकिन कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के DA/DR के लिए बजट की दुहाई क्यों?
भारत में सरकारी धन के उपयोग और वित्तीय प्राथमिकताओं को लेकर गंभीर सवाल उठने चाहिए। जब सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के महँगाई भत्ते (DA) तथा महँगाई राहत (DR) की बात आती है, तो सरकारी खजाने पर पड़ने वाले बोझ का हवाला दिया जाता है। लेकिन जब सरकारी प्रसारक DD News के कार्यक्रम से जुड़े पत्रकार सुधीर चौधरी के प्रोडक्शन कॉन्ट्रैक्ट की राशि ₹15 करोड़ सालाना बताई जाती है, तो जनता यह पूछने के लिए स्वतंत्र है कि सार्वजनिक धन के उपयोग की प्राथमिकताएँ आखिर तय कैसे होती हैं?
मीडिया रिपोर्टों में सुधीर चौधरी से जुड़ी प्रोडक्शन कंपनी के माध्यम से DD News के एक घंटे के कार्यक्रम के लिए ₹15 करोड़ सालाना, GST अतिरिक्त, के कॉन्ट्रैक्ट का उल्लेख किया गया था। यह राशि कार्यक्रम के निर्माण का कॉन्ट्रैक्ट बताई गई थी, न कि सुधीर चौधरी की प्रमाणित व्यक्तिगत सैलरी। इसलिए पूरे ₹15 करोड़ को उनकी निजी कमाई कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। लेकिन इतनी बड़ी राशि के कॉन्ट्रैक्ट का औचित्य, चयन प्रक्रिया और खर्च का विवरण जानना जनता का अधिकार है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकारी खर्च की बात आती है, तो कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के हितों को उतनी ही गंभीरता क्यों नहीं मिलती?
1. सुधीर चौधरी के कॉन्ट्रैक्ट पर पारदर्शिता क्यों जरूरी है?
DD News कोई सामान्य निजी चैनल नहीं, बल्कि सार्वजनिक प्रसारक प्रसार भारती के अंतर्गत काम करने वाला समाचार चैनल है। इसके खर्च और कार्यक्रमों के लिए किए जाने वाले भुगतान पर सार्वजनिक जवाबदेही का प्रश्न स्वाभाविक है।
यदि सुधीर चौधरी के कार्यक्रम के लिए ₹15 करोड़ सालाना का कॉन्ट्रैक्ट किया गया, तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि:
- कॉन्ट्रैक्ट किस प्रक्रिया के तहत दिया गया?
- क्या अन्य प्रोडक्शन कंपनियों से प्रतिस्पर्धी प्रस्ताव मँगाए गए थे?
- ₹15 करोड़ की राशि तय करने का वित्तीय आधार क्या था?
- एंकर की फीस, कर्मचारियों के वेतन, तकनीकी संसाधनों और अन्य उत्पादन खर्चों में कितना-कितना भुगतान निर्धारित था?
- कार्यक्रम की गुणवत्ता और सार्वजनिक उपयोगिता का मूल्यांकन कैसे किया जाता है?
इन सवालों का उद्देश्य किसी पत्रकार को निशाना बनाना नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन के उपयोग में पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। यदि कॉन्ट्रैक्ट उचित प्रक्रिया और ठोस औचित्य पर आधारित है, तो संबंधित संस्थान को तथ्य सार्वजनिक करके स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
2. कर्मचारियों के 18 महीने के DA/DR बकाये का क्या हुआ?
कोविड-19 महामारी के दौरान केंद्र सरकार ने जनवरी 2020 से जून 2021 तक की DA/DR की तीन किस्तों का भुगतान रोक दिया था। बाद में सरकार ने इन 18 महीनों के बकाये का भुगतान नहीं करने का निर्णय स्पष्ट किया। सरकार ने इसका कारण महामारी के दौरान सरकारी वित्त पर पड़े असाधारण दबाव को बताया।
लेकिन इस निर्णय से प्रभावित कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के मन में आज भी सवाल हैं। महामारी के समय सरकारी कर्मचारियों ने अपने दायित्व निभाए और अनेक पेंशनभोगियों ने भी कठिन परिस्थितियों का सामना किया। इसके बावजूद उनके 18 महीने के बकाये का भुगतान नहीं हुआ।
यहाँ सवाल यह है कि क्या उस असाधारण परिस्थिति में लिया गया फैसला हमेशा के लिए अपरिवर्तनीय रहना चाहिए? यदि वित्तीय परिस्थितियों में बदलाव आया है, तो क्या सरकार इस विषय पर पुनर्विचार नहीं कर सकती?
सरकार को कम से कम यह स्पष्ट करना चाहिए कि बकाया भुगतान पर पुनर्विचार की कोई संभावना है या नहीं और इस विषय पर उसका वर्तमान रुख क्या है।
3. हर छह महीने में DA/DR के लिए इंतजार क्यों?
केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए जनवरी और जुलाई से प्रभावी महँगाई भत्ते तथा महँगाई राहत के संशोधन महत्वपूर्ण होते हैं। लेकिन कई बार घोषणा प्रभावी तिथि के बाद होती है, जिससे कर्मचारियों को नई दर का इंतजार करना पड़ता है।
यह सही है कि घोषणा देर से होने पर प्रभावी तिथि से बकाया भुगतान किया जा सकता है। फिर भी सवाल उठता है कि संशोधन की घोषणा समय पर करने के लिए अधिक व्यवस्थित प्रक्रिया क्यों नहीं बनाई जा सकती?
महँगाई किसी सरकारी घोषणा का इंतजार नहीं करती। खाद्य पदार्थों, बिजली, परिवहन, दवाइयों और अन्य जरूरी वस्तुओं पर खर्च लगातार परिवारों के बजट को प्रभावित करता है। पेंशनभोगियों के लिए स्थिति और कठिन हो सकती है, क्योंकि सेवानिवृत्ति के बाद उनकी आय के साधन सीमित हो जाते हैं।
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DA/DR कोई खैरात नहीं, बल्कि महँगाई से राहत देने वाली व्यवस्था है। कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को अपने ही लाभ के लिए बार-बार इंतजार और अनिश्चितता का सामना क्यों करना पड़े?
4. सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन पर एक नजर
सरकारी अधिकारी और कर्मचारी निर्धारित वेतनमान के अनुसार वेतन प्राप्त करते हैं। उनकी पदोन्नति, वेतनवृद्धि, भत्तों और पेंशन के लिए नियम निर्धारित हैं। किसी सरकारी अधिकारी को करोड़ों रुपये का मासिक वेतन मिलने का सामान्य उदाहरण नहीं है।
इसके विपरीत, सुधीर चौधरी के कार्यक्रम के लिए रिपोर्ट किया गया ₹15 करोड़ सालाना का कॉन्ट्रैक्ट एक अलग वित्तीय व्यवस्था है। दोनों की भुगतान संरचना समान नहीं है, इसलिए इनकी सीधी तुलना करके यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पूरी कॉन्ट्रैक्ट राशि एंकर को मिलती है।
फिर भी जनता का सवाल कायम है: जब सार्वजनिक धन खर्च करने की बात आती है, तो क्या प्रत्येक बड़े खर्च का औचित्य उतनी ही गंभीरता से नहीं परखा जाना चाहिए, जितनी गंभीरता से कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की आर्थिक माँगों को परखा जाता है?
किसी कार्यक्रम पर उचित खर्च करने में आपत्ति होना जरूरी नहीं है। आपत्ति तब पैदा होती है, जब खर्च के आधार और उसकी उपयोगिता के बारे में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध न हो, जबकि कर्मचारियों के आर्थिक हितों पर लंबे समय तक कोई सकारात्मक निर्णय न लिया जाए।
5. क्या कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की प्राथमिकता कम है?
सरकारी कर्मचारियों ने अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष सरकारी सेवाओं में लगाए हैं। उन्होंने विभागों, अस्पतालों, रक्षा प्रतिष्ठानों, प्रशासनिक कार्यालयों और अन्य सार्वजनिक संस्थानों में जिम्मेदारियाँ निभाई हैं। सेवानिवृत्ति के बाद पेंशनभोगियों की आर्थिक सुरक्षा भी सार्वजनिक नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
ऐसे में उनकी जायज माँगों को केवल वित्तीय बोझ के नजरिए से देखना उचित नहीं है। सरकार को खर्च की प्राथमिकताएँ तय करते समय आर्थिक अनुशासन के साथ-साथ सामाजिक न्याय, कर्मचारियों के योगदान और बुजुर्गों की जरूरतों पर भी विचार करना चाहिए।
यदि किसी कार्यक्रम के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने का प्रस्ताव स्वीकार किया जा सकता है, तो कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के 18 महीने के DA/DR बकाये पर पुनर्विचार करने की माँग को भी तथ्यों और वित्तीय स्थिति के आधार पर गंभीरता से सुना जाना चाहिए।
यह कहना कि एक कार्यक्रम का पैसा सीधे DA/DR के भुगतान में लगाया जा सकता था, बिना बजटीय विवरण के उचित नहीं होगा। लेकिन यह पूछना बिल्कुल उचित है कि सरकार अपनी विभिन्न वित्तीय प्राथमिकताओं का औचित्य जनता के सामने कितनी पारदर्शिता से रखती है।
6. सरकार और प्रसार भारती से सीधे सवाल
1. सुधीर चौधरी के कार्यक्रम के लिए रिपोर्ट किए गए ₹15 करोड़ सालाना के कॉन्ट्रैक्ट की वास्तविक शर्तें क्या हैं?
2. कॉन्ट्रैक्ट देने की प्रक्रिया और चयन के वित्तीय आधार का विवरण सार्वजनिक क्यों न किया जाए?
3. कार्यक्रम के निर्माण पर कुल खर्च और एंकर को देय व्यक्तिगत फीस में कितना अंतर है?
4. कोविड काल के 18 महीने के DA/DR बकाये पर पुनर्विचार करने की कोई योजना है या नहीं?
5. DA/DR की नई दरों की घोषणा समयबद्ध करने के लिए क्या व्यवस्था की जा सकती है?
6. कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के आर्थिक हितों को सरकारी वित्तीय प्राथमिकताओं में उचित स्थान कैसे दिया जाएगा?
निष्कर्ष: सार्वजनिक धन का हिसाब भी हो, कर्मचारियों के अधिकारों का सम्मान भी
सुधीर चौधरी का नाम इस चर्चा में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके कार्यक्रम से जुड़ी बड़ी कॉन्ट्रैक्ट राशि मीडिया रिपोर्टों में सामने आई है। लेकिन मुद्दा केवल एक पत्रकार या एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। असली मुद्दा है सरकारी धन का उपयोग, सार्वजनिक संस्थानों की जवाबदेही और कर्मचारियों तथा पेंशनभोगियों के आर्थिक हितों के प्रति सरकार का दृष्टिकोण।
सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि सार्वजनिक प्रसारक के बड़े कॉन्ट्रैक्ट का औचित्य क्या है और कर्मचारियों तथा पेंशनभोगियों के 18 महीने के DA/DR बकाये पर उसका रुख क्या है।
जब आम कर्मचारी अपनी वेतन संबंधी माँगों के लिए नियमों और बजट की सीमाओं का सामना करता है, जब पेंशनभोगी महँगाई में अपनी आवश्यकताएँ पूरी करने की कोशिश करता है और जब वर्षों की सेवा के बाद भी उसे अपने आर्थिक हितों से जुड़े फैसलों का इंतजार करना पड़ता है, तब सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
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सरकारी धन किसी व्यक्ति, अधिकारी, पत्रकार या संस्था की निजी संपत्ति नहीं है। उसका उपयोग पारदर्शी, उचित और जवाबदेह तरीके से होना चाहिए।
कर्मचारी और पेंशनभोगी सरकार पर बोझ नहीं हैं। उनके योगदान, आर्थिक सुरक्षा और सम्मान को भी उतनी ही गंभीरता मिलनी चाहिए, जितनी गंभीरता से अन्य सार्वजनिक खर्चों पर निर्णय लिए जाते हैं।
जनता को केवल खर्च का आंकड़ा नहीं, उसका औचित्य चाहिए। कर्मचारियों को केवल आश्वासन नहीं, समयबद्ध निर्णय चाहिए। और पेंशनभोगियों को केवल सहानुभूति नहीं, अपने आर्थिक हितों के प्रति गंभीरता चाहिए।
सरकारी चैनल DD News पर ₹15 करोड़ सालाना का कॉन्ट्रैक्ट—जनता के पैसे की जवाबदेही कौन तय करेगा?
भारत में सरकारी कर्मचारियों के वेतन, पेंशन, महँगाई भत्ते और अन्य सुविधाओं के लिए बजट एवं नियमों का हवाला दिया जाता है। कर्मचारियों की जायज माँगों पर वित्तीय बोझ का तर्क दिया जाता है, लेकिन जब सरकारी प्रसारक DD News के एक कार्यक्रम के लिए सुधीर चौधरी से जुड़े प्रोडक्शन कॉन्ट्रैक्ट की राशि ₹15 करोड़ सालाना बताई जाती है, तो कई गंभीर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सबसे पहले स्पष्ट होना चाहिए कि यह राशि किसी एंकर की व्यक्तिगत सैलरी है या कार्यक्रम के निर्माण का कुल खर्च। मीडिया रिपोर्टों में इसे कार्यक्रम का सालाना कॉन्ट्रैक्ट बताया गया है, न कि प्रमाणित व्यक्तिगत वेतन। इसलिए पूरे ₹15 करोड़ को सुधीर चौधरी की निजी कमाई बताना उचित नहीं होगा।
लेकिन सवाल यह है कि आखिर इस भारी-भरकम खर्च का आधार क्या है?
क्या DD News ने इस कॉन्ट्रैक्ट के लिए पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई? क्या अन्य प्रोडक्शन कंपनियों से भी प्रतिस्पर्धी प्रस्ताव आमंत्रित किए गए? क्या इस राशि का स्वतंत्र वित्तीय मूल्यांकन हुआ? क्या जनता को बताया गया कि कार्यक्रम के निर्माण, तकनीकी संसाधनों, कर्मचारियों और एंकर की फीस पर अलग-अलग कितना खर्च किया जाता है?
एक तरफ सरकारी कर्मचारियों के वेतन और पेंशन से जुड़े मामलों में वित्तीय सीमाओं की चर्चा होती है, वहीं दूसरी तरफ सार्वजनिक धन से चलने वाले संस्थान के बड़े कॉन्ट्रैक्ट पर पारदर्शिता की माँग करना भी उतना ही जरूरी है। सरकारी धन किसी व्यक्ति या संस्था की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि जनता के योगदान से जुटाया गया संसाधन है।
यदि ₹15 करोड़ का कॉन्ट्रैक्ट उचित प्रतिस्पर्धा, स्पष्ट शर्तों और ठोस सार्वजनिक हित के आधार पर दिया गया है, तो संबंधित संस्थान को उसका औचित्य सामने रखने में संकोच नहीं होना चाहिए। लेकिन यदि इसकी शर्तें, चयन प्रक्रिया और खर्च का विवरण जनता के सामने नहीं आता, तो जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सरकार और DD News को स्पष्ट करना चाहिए:
1. ₹15 करोड़ के कॉन्ट्रैक्ट की पूरी शर्तें क्या हैं?
2. चयन किस प्रक्रिया से हुआ और अन्य प्रस्तावों की तुलना कैसे की गई?
3. एंकर की फीस तथा कार्यक्रम के अन्य खर्चों का वास्तविक ब्योरा क्या है?
4. इस खर्च से जनता को क्या लाभ मिलता है और इसकी समीक्षा कौन करता है?
जनता को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि कोई कॉन्ट्रैक्ट नियमों के अनुसार दिया गया है। सार्वजनिक धन के बड़े खर्च का औचित्य और जवाबदेही भी स्पष्ट होनी चाहिए।
सरकारी कर्मचारियों के वेतन पर मितव्ययिता और सरकारी कार्यक्रमों के करोड़ों रुपये के कॉन्ट्रैक्ट पर चुप्पी—यह दोहरा मापदंड नहीं दिखना चाहिए। जनता को जवाब चाहिए, पारदर्शिता चाहिए और अपने पैसे के उपयोग का हिसाब चाहिए।
देश की सीमाओं पर दिन-रात तैनात रहने वाले Border Security Force (BSF) के जवानों की हकीकत बेहद कड़वी है। जिन लोगों ने 20-20 साल अपनी जवानी देश की सुरक्षा में झोंक दी, वही रिटायरमेंट के बाद मामूली पेंशन पर जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं। ₹13,000 जैसी रकम में आज के दौर में किसी परिवार का सम्मानजनक गुजारा होना लगभग असंभव है, लेकिन यही उस व्यवस्था की सच्चाई है जो सैनिकों के बलिदान की बड़ी-बड़ी बातें करती है।
इस स्थिति के पीछे सबसे बड़ा कारण National Pension System (NPS) को माना जा रहा है, जिसके तहत हजारों जवान सीमित और अनिश्चित पेंशन पर निर्भर हो जाते हैं। दूसरी तरफ सत्ता और नौकरशाही से जुड़े कई लोग मोटी पेंशन, भत्ते और कई सुविधाओं का लाभ लेते रहते हैं। यह अंतर साफ बताता है कि सिस्टम में किसकी प्राथमिकता ज्यादा है और किसे नजरअंदाज किया जा रहा है।
सबसे दुखद पहलू यह है कि जो जवान हर दिन गोलियों, घुसपैठ और खतरों के बीच देश की सीमा की रक्षा करते हैं, उन्हें रिटायर होने के बाद भी आर्थिक सुरक्षा की गारंटी नहीं मिलती। जिन लोगों ने अपने परिवार से दूर रहकर, कठोर परिस्थितियों में देश की सेवा की, वही लोग बुजुर्ग होने पर आर्थिक संघर्ष में धकेल दिए जाते हैं।
यह सिर्फ पैसों का मामला नहीं है, बल्कि यह उन सैनिकों के सम्मान का सवाल है जिन्होंने देश के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया। जब एक तरफ ताकतवर और प्रभावशाली लोगों के लिए व्यवस्था हमेशा उदार दिखाई देती है और दूसरी तरफ देश की रक्षा करने वालों को सीमित सहारा मिलता है, तो यह व्यवस्था की गहरी असमानता को उजागर करता है।
अगर यही स्थिति जारी रही, तो यह केवल जवानों के मनोबल को ही नहीं तोड़ेगी बल्कि समाज में भी गहरा असंतोष पैदा करेगी। देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाने वाले लोगों को अगर सम्मानजनक भविष्य नहीं मिलेगा, तो यह व्यवस्था के लिए एक गंभीर नैतिक विफलता मानी जाएगी।
ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह // बलिदान दिवस 🌹
जन्म : 14 जून 1899
मृत्यु : 27 अक्टूबर 1947
22 अक्टूबर सन् 1947 को महाराज हरिसिंह ने जब मुजफ्फराबाद पर पाक सेना के कब्जे की खबर सुनी, तो उन्होंने खुद दुश्मन से मोर्चा लेने का फैसला करते हुए सैन्य वर्दी पहनकर ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह को बुलाया. सिंह ने महाराजा को मोर्चे से दूर रहने के लिए मनाते हुए खुद दुश्मन का आगे जाकर मुकाबला करने का निर्णय लिया. राजेंद्र सिंह महाराजा के साथ बैठक के बाद जब बादामी बाग पहुंचे तो वहां 100 के करीब सिपाही मिले. उन्होंने सैन्य मुख्यालय को संपर्क कर अपने लिए अतिरिक्त सैनिक मांगे. मुख्यालय में मौजूद ब्रिगेडियर फकीर सिंह ने उन्हें 70 जवान और भेजने का यकीन दिलाया, इसी दौरान महाराजा ने खुद मुख्यालय में कमान संभालते हुए कैप्टन ज्वालासिंह को एक लिखित आदेश के संग उड़ी भेजा. इसमें कहा गया था -
"ब्रिगेडियर राजेंद्रसिंह को आदेश दिया जाता है, कि वह हर हाल में दुश्मन को आखिरी सांस और आखिरी जवान तक उड़ी के पास ही रोके रखें."
कैप्टन सिंह 24 अक्टूबर की सुबह एक छोटी सैन्य टुकड़ी के संग उड़ी पहुंचे. उन्होंने सैन्य टुकड़ी ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह को सौंपते हुए महाराजा का आदेश सुनाते हुए खत थमाया. हालात को पूरी तरह से विपरीत और दुश्मन को मजबूत समझते हुए ब्रिगेडियर ने कैप्टन नसीब सिंह को उड़ी नाले पर बने एक पुल को उड़ाने का हुक्म सुनाया, ताकि दुश्मन को रोका जा सके.
इससे दुश्मन कुछ देर के लिए रुक गया, लेकिन जल्द ही वहां गोलियों की बौछार शुरू हो गई. करीब दो घंटे बाद दुश्मन ने फिर हमला बोल दिया. दुश्मन की इस चाल को भांपते हुए ब्रिगेडियर सिंह के आदेश पर कैप्टन ज्वाला सिंह ने सभी पुलों को उड़ा दिया. यह काम शाम साढ़े चार बजे तक समाप्त हो चुका था, लेकिन कई कबाइली पहले ही इस तरफ आ चुके थे. इसके बाद ब्रिगेडियर ने रामपुर में दुश्मन को रोकने का फैसला किया और रात को ही वहां पहुंचकर उन्होंने अपने लिए खंदकें खोदीं. रात भर खंदकें खोदने वाले जवानों को सुबह तड़के ही दुश्मन की गोलीबारी झेलनी पड़ी. मोर्चा बंदी इतनी मजबूत थी कि पूरा दिन दुश्मन गोलाबारी करने के बावजूद एक इंच नहीं बढ़ पाया.
दुश्मन की एक टुकड़ी ने पीछे से आकर सड़क पर अवरोधक तैयार कर दिए, ताकि महाराज के सिपाहियों को वहां से निकलने का मौका नहीं मिले, ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह को दुश्मन की योजना का पता चल गया और उन्होंने 27 अक्टूबर की सुबह एक बजे अपने सिपाहियों को पीछे हटने और सेरी पुल पर डट जाने को कहा. पहला अवरोधक तो उन्होंने आसानी से हटा लिया, लेकिन बोनियार मंदिर के पास दुश्मन की फायरिंग की चपेट में आकर सिपाहियों के वाहनों का काफिला थम गया. पहले वाहन का चालक दुश्मन की फायरिंग में शहीद हो गया.
इस पर कैप्टन ज्वाला सिंह ने अपनी गाड़ी से नीचे आकर जब देखा तो पहले तीनों वाहनों के चालक मारे जा चुके थे, उन्हें ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह नजर नहीं आए, वह अपने वाहन चालक के शहीद होने पर खुद ही वाहन लेकर आगे निकल गए थे. सेरी पुल के पास दुश्मन की गोलियों का जवाब देते हुए वह बुरी तरह जख्मी हो गए. उनकी दाई टांग पूरी तरह जख्मी थी. उन्होंने उसी समय अपने जवानों को आदेश दिया कि वह पीछे हटें और दुश्मन को रोकें. उन्हें जब सिपाहियों ने उठाने का प्रयास किया तो वह नहीं माने और उन्होंने कहा कि वह उन्हें पुलिया के नीचे आड़ में लिटाएं और वह वहीं से दुश्मन को राकेंगे. 27 अक्टूबर सन् 1947 की दोपहर को सेरी पुल के पास ही उन्होंने दुश्मन से लड़ते हुए वीरगति पाई.
अलबत्ता, 26 अक्टूबर सन् 1947 की शाम को जम्मू कश्मीर के भारत में विलय को लेकर समझौता हो चुका था और 27 अक्टूबर को जब राजेंद्र सिंह मातृभूमि की रक्षार्थ बलिदान हुए तो उस समय कर्नल रंजीत राय भारतीय फौज का नेतृत्व करते हुए श्रीनगर एयरपोर्ट पर पहुंच चुके थे.
युद्ध विशेषज्ञों का दावा है कि अगर वह पीछे नहीं हटते तो कबाइली 23 अक्टूबर की रात को ही श्रीनगर में होते. ब्रिगेडियर राजेंद्रसिंह ने जो फैसला लिया था वह कोई चालाक और युद्ध रणनीति में माहिर व्यक्ति ही ले सकता था. उनके इसी फैसले और शहादत के कारण कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा बनने से बचा है.
ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह को मरणोपरांत देश के पहले महावीर चक्र से सम्मानित किया गया. फील्ड मार्शल के.एम.करिअप्पा ने 30 दिसंबर सन् 1949 को जम्मू संभाग में बगूना सांबा के इस सपूत की वीर पत्नी रामदेई को सम्मानित किया था
महान योद्धा बंदा सिंह बहादुर (बन्दा बैरागी) // जयंती 🌹
जन्म : 27 अक्टूबर 1670
मृत्यु : 09 जून 1716
मुगलों को नाकों चने चबवाने वाले योद्धा बन्दा बैरागी का जन्म जम्मू कश्मीर के पुंछ में 27 अक्टूबर, 1670 को ग्राम तच्छल किला में श्री रामदेव के घर हुआ। गुरु गोविन्द सिंह ने बन्दा बहादुर नाम दिया और उन्हें पाँच तीर, एक निशान साहिब, एक नगाड़ा और एक हुक्मनामा दिया। उन्होंने बंदा बहादुर को अपने दोनों छोटे पुत्रों को दीवार में चिनवाने वाले, सरहिन्द के नवाब से बदला लेने को कहा।
कुछ कर गुज़रने को तत्पर बन्दा हजारों सिख सैनिकों को साथ लेकर पंजाब की ओर चल दिये। बंदा बहादुर एक तूफ़ान बन गए जिसे रोकना किसी के बस में नहीं था। सबसे पहले उन्होंने श्री गुरु तेगबहादुर जी का शीश काटने वाले जल्लाद जलालुद्दीन का सिर काटा। फिर गुरु गोविन्द सिंह के दोनों पुत्रों को दीवार में चिनवाने वाले सरहिन्द के नवाब वजीर खान का वध किया।
उनके पराक्रम से भयभीत मुगलों ने दस लाख फौज लेकर उन पर हमला किया और धोखे से 17 दिसंबर, 1715 को उन्हें पकड़ लिया। मुग़ल इतने डरे हुए थे कि बंदा बहादुर को प्रताड़ित करने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। बंदा बहादुर को अपमानित करने के लिए उन्हें लोहे के एक पिंजड़े में बंदी बनाकर, हाथी पर लादकर सड़क मार्ग से दिल्ली लाया गया। युद्ध में जिन सिख सैनिकों ने वीरगति पायी थी उनके सिर काटकर, उन्हें भाले की नोक पर टाँगकर दिल्ली लाया गया, ताकि रास्ते में सभी इस भयावह दृश्य को देखें। उनके साथ हजारों सिख भी कैद किये गये थे। रास्ते भर गर्म चिमटों से बन्दा बैरागी का माँस नोचा जाता रहा।
अत्याचारी मुग़लों ने बन्दा को भयभीत करने के लिए उनके 5 वर्षीय पुत्र अजय सिंह को उनकी गोद में लेटाकर, बन्दा के हाथ में छुरा देकर उसको मारने को कहा गया। बन्दा ने अपने ही बेटे की हत्या करने से मना कर दिया। इस पर जल्लाद ने उस पाँच साल के बच्चे के दो टुकड़े कर उसके दिल का माँस निकलकर बन्दा के मुँह में ठूँस दिया। पर वीर बंदा बैरागी तो इन सबसे ऊपर उठ चुके थे। गरम चिमटों से माँस नोचे जाने के कारण उनके शरीर में केवल हड्डियाँ ही बची थीं। इतने निर्मम अत्याचार करने के बाद भी जब बंदा का मनोबल नहीं टूटा तो 9 जून, 1716 को दुश्मनों ने इस वीर को हाथी से कुचलवा दिया गया। इस प्रकार बन्दा बैरागी वीरगति को प्राप्त हुए। अपनी कौम की रक्षा के लिए बंदा बैरागी का बलिदान विलक्षण है।
एक चाट वाला था। जब भी उसके पास चाट खाने जाओ तो ऐसा लगता कि वह हमारा ही रास्ता देख रहा हो। हर विषय पर उससे बात करने में बड़ा मज़ा आता था। कई बार उसे कहा कि भाई देर हो जाती है, जल्दी चाट लगा दिया करो, पर उसकी बात ख़त्म ही नहीं होती थी। एक दिन अचानक उसके साथ मेरी कर्म और भाग्य पर बात शुरू हो गई।
तक़दीर और तदबीर की बात सुन मैंने सोचा कि चलो आज उसकी फ़िलासॉफ़ी देख ही लेते हैं। मैंने उससे एक सवाल पूछ लिया— आदमी मेहनत से आगे बढ़ता है या भाग्य से?
उसने जो जवाब दिया, उसे सुनकर मेरे दिमाग़ के सारे जाले साफ़ हो गए। वह चाट वाला मुझसे कहने लगा— “आपका किसी बैंक में लॉकर तो होगा?”
मैंने कहा— “हाँ।”
तो उसने कहा— “उस लॉकर की चाबियाँ ही इस सवाल का जवाब हैं। हर लॉकर की दो चाबियाँ होती हैं— एक आपके पास और एक मैनेजर के पास। आपके पास जो चाबी है वह परिश्रम है और मैनेजर के पास वाली भाग्य।”
जब तक दोनों चाबियाँ नहीं लगतीं, लॉकर का ताला नहीं खुल सकता। आप कर्मयोगी पुरुष हैं और मैनेजर भगवान! आपको अपनी चाबी भी लगाते रहना चाहिए। पता नहीं ऊपर वाला कब अपनी चाबी लगा दे। कहीं ऐसा न हो कि भगवान अपनी भाग्य वाली चाबी लगा रहा हो और हम परिश्रम वाली चाबी न लगा पाएं, और ताला खुलने से रह जाए।
शिक्षा:-
कर्म करते रहिए, पता नहीं कब भाग्य आपका साथ देने आ जाए। केवल भाग्य के भरोसे मत रहिए, परिश्रम अवश्य करिए ताकि भाग्य का साथ मिलने पर लक्ष्य प्राप्ति हो सके।
सदैव प्रसन्न रहिए — जो प्राप्त है, पर्याप्त है।
जिसका मन मस्त है — उसके पास समस्त है।।
भारतीय पैदल सेना दिवस (Infantry Day) 🇮🇳
हर साल 27 अक्टूबर को भारतीय पैदल सेना दिवस (Infantry Day) मनाया जाता है। देश की पैदल सेना के अभूतपूर्व शौर्य के सम्मान में इंफैन्ट्ररी डे का आयोजन होते आ रहा है। देश की पैदल सैनिकों का योगदान जम्मू और कश्मीर को पाकिस्तान के चपेट से बचाने के लिए याद किया जाता है। सभी सैनिक आजाद भारत के पहले 'मिलिट्री ऑपरेशन' के हीरो माने जाते हैं। सैनिकों ने पाकिस्तान के इरादों का निस्तनाबुत किया था। जिसके लिए देश आज यानी 27 अक्टूबर को पैदल सेना दिवस के रूप में याद करता है और उन वीरों का सम्मान करता है।
आज के दिन क्या हुआ था?
देश के आजाद होते ही पाकिस्तानी सैनिक कबायली बनकर जम्मू और कश्मीर में घुस पैठ करने में प्रयास रहे थे। कश्मीर के कई हिस्सों में कबायली फैलने लग गए। जब इस बात की भनक कश्मीर के राजा हरिसिंह को लगी तो वो हैरान हो रह गए। अब उनके पास कोई चारा नहीं बचा था। भारतीय सेना से मदद के लिए गुहार लगाई। फिर सेना ने कश्मीर में दस्तक दी। 27 अक्टूबर को सिख रेजीमेंट की पहली बटालियन श्रीनगर एयरबेस पहुंचा। इसके बाद सेना ने कश्मीर को अपने कंट्रोल में लेने का प्रयास किया और इसमें काफी हद तक सफल भी हुए।
तेजी से फैल रहे थे कबायली
कबायली को बैक सपोर्ट पाकिस्तानी रेंजर दे रहे थे। इन दुश्मनों को रोकने के लिए सेना की सिख रेजिमेंट एक दीवार बनकर खड़ी हो गई। पाकिस्तानी तेजी से जम्मू-कश्मीर में अपना पैठ जमा रहे थे। लिंक रोड के जरिए अगर भारतीय सैनिक को भेजा जाता तो काफी समय लग जाता और जरा सी भी लेट होना की पाकिस्तान के हाथ में कश्मीर का जाना होता।
पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू ने ली एक्शन
आनन-फानन में 26 अक्टूबर की रात को एक आपातकालीन बैठक आयोजित की गई है, जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने सिख रेजीमेंट को वायु मार्ग से भेजने का फैसला लिया। 27 अक्टूबर की सुबह भारतीय सैनिकों को लेकर दो विमानों ने कश्मीर के लिए उड़ान भरी। इसके अलावा कई जवानों को विशेष विमान से मैदान में उतारने के लिए निर्णय लिया गया। इसी दिन को इतिहास में याद रखने के लिए पैदल सैनिक दिवस मनाया जाता है।
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एक गाँव के बाहर एक पुराना रास्ता था, जो खेतों से होते हुए मुख्य सड़क तक जाता था। वर्षों से गाँव के लोग उसी रास्ते का उपयोग करते आ रहे थे।
बरसात के बाद एक दिन रास्ते के बीचों-बीच मिट्टी का एक बड़ा ढेर जमा हो गया। रास्ता इतना संकरा हो गया कि साइकिल और बैलगाड़ी तक निकालना मुश्किल हो गया।
गाँव के लोग वहाँ से गुजरते हुए कहते, “अब इस रास्ते से निकलना मुश्किल है। कोई इसे ठीक करवाए तो अच्छा हो।”
कई लोग आगे बढ़ जाते, लेकिन कोई उस ढेर को हटाने की कोशिश नहीं करता।
उसी गाँव में अरुण नाम का एक युवक रहता था। वह सुबह खेत पर जाते समय उसी रास्ते से गुजरता था। एक दिन उसने देखा कि एक बुजुर्ग किसान अपनी साइकिल लेकर मिट्टी के ढेर के पास खड़े हैं।
अरुण ने पूछा, “चाचा, क्या हुआ?”
बुजुर्ग बोले, “बेटा, साइकिल आगे नहीं जा रही। शायद आज दूसरा रास्ता लेना पड़ेगा।”
अरुण ने रास्ते को ध्यान से देखा। मिट्टी का ढेर बहुत बड़ा था, लेकिन उसके एक किनारे पर थोड़ी-सी जगह दिखाई दे रही थी।
उसने कहा, “चाचा, अगर हम पूरी मिट्टी हटाने के बजाय पहले किनारे की यह जगह साफ कर दें, तो शायद साइकिल निकल सकती है।”
दोनों ने मिलकर किनारे की मिट्टी हटानी शुरू की। थोड़ी देर में साइकिल निकलने लायक रास्ता बन गया।
अगले दिन अरुण अपने साथ फावड़ा लेकर आया। उसने रास्ते के उस हिस्से को थोड़ा और साफ किया। कुछ और गाँव वालों ने भी उसका साथ दिया।
कुछ ही समय में रास्ता इतना चौड़ा हो गया कि लोग आसानी से आने-जाने लगे।
उसी शाम गाँव के वही बुजुर्ग वहाँ खड़े होकर साफ हुए रास्ते को देख रहे थे। उन्होंने अरुण से कहा, “बेटा, आज तुमने मुझे एक बहुत बड़ी बात समझा दी।”
अरुण ने पूछा, “मैंने क्या समझाया, चाचा?”
बुजुर्ग मुस्कुराए और बोले, “कई दिनों से हम सब इस मिट्टी के ढेर को देखते रहे और यही सोचते रहे कि रास्ता बंद है। तुमने उसी रास्ते को देखकर यह सोचा कि इसमें अभी कौन-सी जगह खुली है।”
थोड़ी देर रुककर उन्होंने कहा, “अब समझ आया कि परेशानी हमेशा उतनी बड़ी नहीं होती, जितनी हमारी नजर उसे बना देती है। हम अगर केवल रुकावट को देखते रहें तो रास्ता बंद दिखाई देता है; लेकिन समाधान खोजने की कोशिश करें तो उसी रुकावट के बीच से भी रास्ता निकल सकता है।”
अरुण चुपचाप उनकी बात सुनता रहा।
बुजुर्ग ने आगे कहा, “आज से जब भी हमारे सामने कोई कठिनाई आएगी, हम सबसे पहले यह नहीं कहेंगे कि ‘यह नहीं हो सकता।’ हम यह सोचेंगे कि ‘इसमें क्या किया जा सकता है?’ शायद समाधान वहीं से शुरू होगा।”
उस दिन मिट्टी का ढेर तो हट गया, लेकिन गाँव वालों की सोच में उससे भी बड़ी जगह बन गई।
शिक्षा :-
कठिनाई को देखकर रुक जाना आसान है, लेकिन उसके बीच से समाधान खोजने की कोशिश ही आगे बढ़ने का रास्ता दिखाती है। परिस्थितियाँ हमेशा हमारे अनुसार नहीं होतीं, पर उन्हें देखने का हमारा दृष्टिकोण हमारे हाथ में होता है।
सदैव प्रसन्न रहिये - जो प्राप्त है, पर्याप्त है।
जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है।।
ये कौनसा फोन है? बड़ा सुंदर सा दिख रहा है। @grok भाई साहब कृपया विस्तृत जानकारी दो
बिग ब्रेकिंग न्यूज 💔
नॉर्थ कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन का ब्रेन hemorrhage से मृत्यु हो गई?
@grok भाई साहब सच्चाई क्या है कृपया विस्तृत जानकारी दो...
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के आदर्श जीवन और चरित्र को पवित्र महाकाव्य ‘रामायण’ के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाने वाले आदिकवि महर्षि वाल्मीकि जी की जयंती पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
महर्षि वाल्मीकि जी के पावन विचार हमें सत्य, संयम, अनुशासन एवं कर्तव्यनिष्ठा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते आए हैं। उनके आदर्श सदैव समाज को सदाचार, नैतिकता और मानवीय मूल्यों के प्रति समर्पित रहने का मार्गदर्शन करते रहेंगे।
आदिकवि महर्षि वाल्मीकि जी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
ये क्या बबाल है? देखने से तो कुछ पता नहीं चल रहा है। ऐसे मिट्टी हवा में कैसे उछल सकती है?
@grok भाई साहब सच्चाई क्या है कृपया विस्तृत जानकारी दो






