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ख़त लिखने वाला लड़का। Business / Work contact: 9508435822 [email protected]

india
Joined October 2022
चुनाव आयोग हमें पागल समझता है क्या? या तो हम सबको कुछ समझ नहीं आता, या फिर चुनाव आयोग हमें पागल समझता है। एक आम नागरिक के तौर पर मेरे कुछ सवाल हैं। पहले जान लीजिए कि चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा है। अपने हलफनामे में आयोग ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा है कि SIR से जुड़े तीनों आदेश, जो 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को जारी हुए थे, आयोग ने सर्वसम्मति से लिए थे। आयोग का तर्क है कि याचिका पूरी तरह एक अखबार की रिपोर्ट पर टिकी है, याचिकाकर्ता ने तथ्यों की खुद से पुष्टि नहीं की, इसलिए याचिका सुनवाई लायक ही नहीं है। आयोग ने यह भी कहा कि उसने कभी कोई अंदरूनी नोट या फाइल मीडिया को न जारी की, न जारी करने की इजाज़त दी। फॉर्म 6 पर आयोग का कहना है कि उसने अपने SIR आदेशों के ज़रिए फॉर्म 6 में कोई बदलाव नहीं किया। आयोग ने खुद माना कि मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत तय फॉर्म में बदलाव सिर्फ केंद्र सरकार कर सकती है। उसके मुताबिक SIR के दौरान जो घोषणा ली जा रही है, वह एक अलग दस्तावेज़ है, फॉर्म 6 में संशोधन नहीं। अब मेरे सवाल। पहला सवाल: आयोग कह रहा है कि उसे एक अखबार की खबर के आधार पर कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। तो फिर आयोग ने 26 सितंबर को यह क्यों तय किया कि आगे से IT मॉड्यूल और पोर्टल से जुड़ी हर नई पहल पर आयोग की मंज़ूरी से पहले अधिकारियों की समिति में चर्चा होगी? आयोग के अपने प्रेस नोट (संख्या ECI/PN/120/2026, बिंदु iv) में "अब से" (Henceforth) लिखा है। इसका मतलब तो यही हुआ कि उससे पहले ऐसा नहीं हो रहा था। यानी खबर सही थी। दूसरा सवाल: 26 सितंबर को आयोग ने अपनी बैठक के बाद जो प्रेस नोट जारी किया, उसके बिंदु (iii) में साफ लिखा है: “SIR के लिए फॉर्म 6 के साथ जोड़ी गई घोषणा को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया है। गैर-SIR अवधि में नियमों (मतदाता पंजीकरण नियम, 1960) के मुताबिक लागू फॉर्म ही इस्तेमाल होंगे।” यानी उस दिन आयोग खुद कह रहा था कि यह घोषणा "फॉर्म 6 के साथ जोड़ी गई" है और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर मुहर लगाई है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि उसने ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया था। अब आयोग कह रहा है कि फॉर्म 6 में कोई बदलाव हुआ ही नहीं, घोषणा तो एक अलग दस्तावेज़ थी। और उसी बिंदु की दूसरी लाइन पर गौर कीजिए। अगर SIR के दौरान भी नियमों वाला फॉर्म ही चल रहा था, तो यह लिखने की ज़रूरत क्यों पड़ी कि "गैर-SIR अवधि में नियमों के मुताबिक फॉर्म इस्तेमाल होंगे"? इसका सीधा मतलब है कि SIR के दौरान जो फॉर्म चल रहा था, वह नियमों में तय फॉर्म से अलग था। पहले कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया, जब कोर्ट ने मना कर दिया तो कह रहे हैं कि बदलाव किया ही नहीं। अगर बदलाव हुआ ही नहीं था, तो 26 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट का नाम लेने की ज़रूरत क्यों पड़ी? कुल मिलाकर, सच सामने आ जाने के बाद भी चुनाव आयोग देश और उसके लोकतंत्र के साथ मज़ाक कर रहा है।
#BREAKING Form 6 has not been amended, ECI tells Supreme Court.
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आज तक एक बात समझ नहीं आई: भाजपा की हर रैली में एंबुलेंस आखिर कहां से आ जाती है? मोदी जी कहीं जा रहे हों, तब आ जाती है। कोई बड़ी रैली हो रही हो, तब भी आ जाती है। और हर बार ये लोग उसे रास्ता देते हुए ही नज़र आते हैं। कभी आपने देखा है कि भाजपा की कोई बड़ी रैली हो, और वहां एंबुलेंस न पहुंचे?
संवेदनशील नेतृत्व ऐसा होना चाहिए, रैली- रेला अपनी जगह, विरोध और राजनीति अपनी जगह, प्रदर्शन और भाषण अपनी जगह, सबसे पहले मानवता और संवेदनशीलता, कुछ ऐसा ही नज़ारा हरियाणा के रोहतक में देखने को मिला, जब बीजेपी अध्यक्ष @NitinNabin ने सब कुछ छोड़ कर पहले एम्बुलेंस को जाने की जगह देने के लिया कार्यकर्ताओं को निर्देश दिए और ख़ुद मंच से व्यवस्था बनाने लगे.
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प्रोटेस्ट रोकते-रोकते दिल्ली पुलिस को खुद प्रोटेस्ट करना आ गया है।
दिल्ली पुलिस ही धरने पर बैठ गई है अमित शाह जी अब इनको हटाने के लिए सेना बुलायेंगे क्या???
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"सितारे दूर होते हैं, पर शाहरुख हमारी बालकनी की मुंडेर पर आ बैठे।" प्रिय शाहरुख, @iamsrk आज दो नवंबर है। कैलेंडर के लिए यह एक तारीख भर है, पर हम जैसे करोड़ों लोगों के लिए यह वह दिन है जब आसमान ने दिल्ली की एक गली में एक सितारा उतारा और उसे ज़मीन पर चलना सिखा दिया। इकसठवाँ साल मुबारक हो। लोग कहते हैं कि सितारे दूर होते हैं। तुमने इस कहावत को झुठला दिया। तुम वह सितारा निकले जो आसमान में टँगा नहीं रहा, बल्कि उतरकर हमारी बालकनी की मुंडेर पर आ बैठा। हमने तुम्हें परदे पर देखा, पर महसूस अपने भीतर किया, जैसे कोई पुरानी धुन जिसे हम बरसों से गुनगुना रहे थे और जिसका नाम आज तक नहीं जानते थे। तुम्हारी कहानी मुझे उस नदी की याद दिलाती है जो किसी पहाड़ की गोद से नहीं, एक सूखे मैदान की दरार से फूटी थी। न कोई विरासत थी, न कोई सीढ़ी, बस आँखों में एक ज़िद थी और सीने में एक बेचैनी। पर नदी को रास्ता कब किसी ने दिया है? उसने पत्थर काटे, मोड़ मुड़े, कई बार सूखने के क़रीब पहुँची, और फिर भी बहती रही। आज उसी नदी के किनारे पूरी एक सभ्यता बसी है, जिसमें हम सब अपनी-अपनी प्यास लेकर आते हैं। तुमने हमें मोहब्बत करना सिखाया, पर उस तरह नहीं जैसे किताबें सिखाती हैं। तुमने बाँहें फैलाकर सिखाया कि मोहब्बत एक खुला दरवाज़ा है। राज की शरारत में हमने अपनी जवानी पहचानी। देवदास की टूटन में अपने अधूरे इश्क़ का मातम सुना। स्वदेस की मिट्टी में अपनी जड़ों की पुकार सुनी। और कबीर ख़ान के सख़्त चेहरे के पीछे यह जाना कि असली जीत कभी अकेली नहीं होती, वह एक पूरी टोली की होती है। सच कहूँ तो तुम अभिनेता से ज़्यादा एक आईना हो। हर बार जब तुम परदे पर हँसे, हमारे भीतर कोई गिरह खुली। जब तुम रोए, हमने अपने वे आँसू बहा दिए जो बरसों से पलकों के पीछे जमा थे। तुमने हमें यह इजाज़त दी कि हम कमज़ोर हो सकें और फिर भी सिर उठाकर चल सकें। इकसठ बरस सिर्फ़ गिनती नहीं होते। ये उस बाग़ की तरह हैं जिसमें हर मौसम की छाप है। कहीं वसंत की पहली कोंपलें, कहीं पतझड़ की सुनहरी उदासी, कहीं तूफ़ान से टूटी कोई शाख़, और फिर उसी टूटन से फूटा कोई नया अंकुर। तुमने हर मौसम को जिया और हर मौसम से कुछ बेहतर होकर निकले। यही शायद तुम्हारे होने का सबसे बड़ा सबक़ है कि उम्र वह नहीं जो चेहरे पर लिखी जाती है, उम्र वह है जो आँखों में बची रहती है, और तुम्हारी आँखों में आज भी वही बच्चा जागता है जो कभी दिल्ली की गलियों में बड़े ख़्वाब देखा करता था। इस जन्मदिन पर मेरी दुआ है कि तुम्हारी सेहत किसी सदाबहार चिराग़ की तरह जलती रहे, तुम्हारा घर हँसी की रोशनी से भरा रहे, और तुम्हारा सफ़र उस क्षितिज की ओर बढ़ता रहे जहाँ आसमान और ज़मीन एक-दूसरे को छू लेते हैं। जब कभी थकान उतरे, तो याद रखना कि कहीं दूर, अनगिनत अनजान घरों में, कोई तुम्हारे नाम की दुआ पढ़कर सोता है। तुम्हें शायद कभी पता न चले कि तुमने कितनी तन्हा शामों को अपनी आवाज़ से रोशन किया है, पर यक़ीन मानो, यह क़र्ज़ हम पर रहेगा, और हम इसे मोहब्बत से चुकाते रहेंगे। जन्मदिन मुबारक, शाहरुख। तुम यूँ ही मुस्कुराते रहो, ताकि हम भी मुस्कुराना न भूलें। ख़त लिखने वाला लड़का। चाय इश्क़ और राजनीति।
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उत्तराखंड कांग्रेस की बैठक से हरीश रावत गायब: तस्वीर में नहीं, कहानी में ढूंढिए वजह उत्तराखंड कांग्रेस में हरीश रावत का भविष्य अधर में लटका हुआ है। आज कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के घर पर उत्तराखंड को लेकर एक बैठक हुई, जिसमें राज्य की प्रभारी कुमारी शैलजा भी शामिल थीं। लेकिन कांग्रेस की ओर से जारी किसी भी तस्वीर में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत नज़र नहीं आए। इसकी वजह आज की तस्वीरों में ढूंढने के बजाय, हाल के दिनों में उत्तराखंड की राजनीति में हुई हलचल को समझना ज़रूरी है, खासकर वह हलचल जो हरीश रावत से जुड़ी है। विवाद की शुरुआत: "धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा" सारा विवाद तब शुरू हुआ, जब हरीश रावत ने उत्तराखंड में अपनी तरफ से एक अलग "धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा" निकालने का ऐलान किया। उनका कहना था कि वे 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी कार्यकर्ताओं को झकझोरना और जनता से सीधे जुड़ना चाहते हैं। लेकिन पार्टी को यह रास नहीं आया। 1 अक्टूबर 2026 को प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा ने पत्र लिखकर और मौखिक रूप से भी इस यात्रा पर आपत्ति जताई। संगठन का मानना था कि अगर कोई नेता प्रदेश कांग्रेस कमेटी की सहमति या आधिकारिक तालमेल के बिना ऐसी समानांतर यात्रा निकालता है, तो कार्यकर्ताओं और जनता में गुटबाज़ी का गलत संदेश जाता है। बगावती तेवर कुमारी शैलजा की मनाही के बावजूद हरीश रावत नहीं रुके। 5 अक्टूबर 2026 को उन्होंने यात्रा रोकने से साफ इनकार कर दिया। पूर्व मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर लिखा, "चुनौती बड़ी है, लेकिन अब रुकना नहीं है...", और अपनी यात्रा जारी रखी। हाईकमान की सख्ती और दिल्ली का बुलावा इसके बाद मामला दिल्ली तक पहुंचा। पार्टी के संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने सख्त रुख अपनाते हुए साफ कर दिया कि पार्टी में किसी भी नेता की निजी या समानांतर यात्रा बर्दाश्त नहीं की जाएगी, और सिर्फ सामूहिक और संगठन के कार्यक्रम ही चलेंगे। हरीश रावत को अपना रुख साफ करने के लिए दिल्ली तलब किया गया। बैकफुट पर रावत हाईकमान की सख्ती के बाद हरीश रावत बैकफुट पर आ गए। उन्होंने कहा कि उनका मकसद "कांग्रेस को जगाना" था, जो पूरा हो गया, और अपनी आगे की 8-10 यात्राएं स्थगित कर दीं। इसी बीच विवाद बढ़ने और उनके एक करीबी पर ED और दूसरी जांचों की चर्चा के बीच, हरीश रावत ने दर्द जताते हुए मीडिया और सोशल मीडिया पर CWC और संगठन की ज़िम्मेदारियों से हटने की इच्छा भी जताई। आखिर में उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व को सफाई दी कि उनका इरादा पार्टी को नुकसान पहुंचाने का नहीं था। हाईकमान और कुमारी शैलजा के साथ बैठक के बाद उन्होंने पार्टी लाइन मानने और संगठन के साथ मिलकर काम करने पर सहमति जताई। सिर्फ यात्रा का झगड़ा नहीं अगर यह सिर्फ यात्रा की लड़ाई होती, तो भी समझ में आता। लेकिन उनके करीबी लोगों पर गंभीर आरोप तक लगे हैं। यह भी कहा जाता है कि हरीश रावत इस चुनाव में अपने परिवार की राजनीति को मज़बूत करना चाहते हैं। यही पूरा गणित हरीश रावत को आज की बैठक से दूर रखने के लिए काफी था। तो बैठक में कौन-कौन था? तस्वीरों में बाएं से ये नेता नज़र आए: हरक सिंह रावत, उत्तराखंड के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री के.सी. वेणुगोपाल, AICC संगठन महासचिव यशपाल आर्य, उत्तराखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष करन माहरा, उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष कुमारी शैलजा, कांग्रेस महासचिव और उत्तराखंड प्रभारी आगे क्या? अब देखना दिलचस्प होगा कि हरीश रावत कैसे मज़बूती से वापसी करते हैं, क्योंकि वे उत्तराखंड की राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं। जिसे यकीन न हो, वह विजय बहुगुणा की कहानी जान ले। और एक कहानी 2016 की भी है, जो फिर कभी, अगर आप चाहेंगे। बाकी, हरीश रावत अभी भी कांग्रेस में हैं, और सोनिया गांधी के पुराने भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते हैं।
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"मेरी लीडर सोनिया गांधी जी, स्पेशल थैंक्स टू लेफ्ट पार्टीज़" - ममता बनर्जी आज रामलीला मैदान में ममता बनर्जी ने यही कहा: "मेरी लीडर सोनिया गांधी जी, स्पेशल थैंक्स टू लेफ्ट पार्टीज़।" यह दिखाता है कि राजनीति कितनी जल्दी बदल जाती है। ज़रा दिसंबर 2023 याद कीजिए। तब INDIA गठबंधन की सारी खींचतान ममता बनर्जी को लेकर ही तो थी। माना जाता है कि नीतीश कुमार को गठबंधन का संयोजक बनाने पर बाकी सब तैयार थे, लेकिन ममता नहीं मानीं। उन्हें बंगाल में अकेले चुनाव लड़ना था। तब लगता था कि ममता बंगाल से बाहर कहीं नहीं जाएंगी, न किसी के आगे झुकेंगी। लेकिन सच क्या निकला, यह आपने देख ही लिया। और आज उन्हें याद आ रहा है कि उनकी नेता सोनिया गांधी हैं, और मोदी को जाना होगा। अगर यही मज़बूती और एकजुटता तब दिखा दी होती, तो आज हालात कुछ और ही होते। और एक बात पर खास ध्यान दीजिए: "स्पेशल थैंक्स टू लेफ्ट पार्टीज़।" वही लेफ्ट, जिसके खिलाफ लड़कर ममता ने बंगाल में अपनी पूरी राजनीति खड़ी की। आखिर ममता की यह कौन-सी आत्मा जाग गई है?
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"हम नरेंद्र मोदी को नहीं छोड़ेंगे, हम ज्ञानेश कुमार को नहीं छोड़ेंगे" "हम नरेंद्र मोदी को नहीं छोड़ेंगे, हम ज्ञानेश कुमार को नहीं छोड़ेंगे।" ये शब्द देश के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के हैं। इनसे साफ है कि यह लड़ाई अब कानूनी होगी, और लंबी चलेगी। और एक बात ध्यान में रखिए: अगर यह लड़ाई कानूनी रास्ते पर गई, तो सबसे ज़्यादा नुकसान ज्ञानेश कुमार को होगा। यह भी याद रखना ज़रूरी है कि अब तक इस लड़ाई में भाजपा ने भी कानून का पूरा सहारा लिया है। मानहानि के एक मामले में ही राहुल गांधी की संसद सदस्यता चली गई थी, और उन्हें अपना सरकारी आवास तक छोड़ना पड़ा था। आज जब राहुल गांधी ने मंच से कहा कि सब जाएंगे, सब जेल जाएंगे, और ज्ञानेश कुमार को तो अब गवाह बन जाना चाहिए, तो वहां का माहौल देखने लायक था।
ज्ञानू का जेल जाना तय है
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ये सब राम की लीला हैं। जो अभी केवल राम लीला मैदान में हो रही है, एक समय आयेगा पूरा देश बोलेगा- कर हर मैदान फतेह।
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"मेरी लीडर सोनिया गांधी जी, स्पेशल थैंक्स टू लेफ्ट पार्टीज़" - ममता बनर्जी आज रामलीला मैदान में ममता बनर्जी ने यही कहा: "मेरी लीडर सोनिया गांधी जी, स्पेशल थैंक्स टू लेफ्ट पार्टीज़।" यह दिखाता है कि राजनीति कितनी जल्दी बदल जाती है। ज़रा दिसंबर 2023 याद कीजिए। तब INDIA गठबंधन की सारी खींचतान ममता बनर्जी को लेकर ही तो थी। माना जाता है कि नीतीश कुमार को गठबंधन का संयोजक बनाने पर बाकी सब तैयार थे, लेकिन ममता नहीं मानीं। उन्हें बंगाल में अकेले चुनाव लड़ना था। तब लगता था कि ममता बंगाल से बाहर कहीं नहीं जाएंगी, न किसी के आगे झुकेंगी। लेकिन सच क्या निकला, यह आपने देख ही लिया। और आज उन्हें याद आ रहा है कि उनकी नेता सोनिया गांधी हैं, और मोदी को जाना होगा। अगर यही मज़बूती और एकजुटता तब दिखा दी होती, तो आज हालात कुछ और ही होते। और एक बात पर खास ध्यान दीजिए: "स्पेशल थैंक्स टू लेफ्ट पार्टीज़।" वही लेफ्ट, जिसके खिलाफ लड़कर ममता ने बंगाल में अपनी पूरी राजनीति खड़ी की। आखिर ममता की यह कौन-सी आत्मा जाग गई है?
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हनुमान बाबा मदद करेंगे, लेकिन एजेंसियां किसकी मदद कर रही हैं? अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया से लेकर आज़म खान तक केवल एक पैटर्न वह भी बीजेपी का "हनुमान बाबा मदद करेंगे।" यह नारा रामपुर में आज़म खान के समर्थन में लगा। अब हनुमान बाबा आज़म खान की मदद करेंगे या नहीं, यह तो पता नहीं। लेकिन इस देश की जांच एजेंसियां किसकी मदद करती हैं, यह समझना ज़्यादा मुश्किल नहीं है। सच कहूं तो मुझे इस देश की पुलिस से ज़्यादा भरोसा ED पर है। यह किसी भी आरोपी को छूटने ही नहीं देती। माफ कीजिएगा, किसी भी "विपक्षी" आरोपी को। और सबसे कमाल की बात यह है कि इसे कभी जल्दबाज़ी नहीं होती। जैसे ही अदालत किसी विपक्षी नेता को एक मामले में राहत देती है, एजेंसियां पहले से पूरी तैयारी करके बैठी होती हैं कि अब दूसरे मामले में गिरफ्तारी होगी। यकीन न हो, तो दिल्ली का ही ED और CBI का एक खेल याद कर लीजिए। आपको याद होगा कि ये एजेंसियां किस तरह काम करती हैं। बस इन मामलों को जोड़कर देखिए, सब समझ आ जाएगा। अरविंद केजरीवाल का मामला: ED ने 21 मार्च 2024 को केजरीवाल को उनके घर से गिरफ्तार किया। 20 जून 2024 को ट्रायल कोर्ट ने ED वाले मामले में उन्हें ज़मानत दे दी, जिस पर अगले ही दिन हाईकोर्ट ने रोक लगा दी। और फिर, जब केजरीवाल तिहाड़ जेल में ही बंद थे, तब 26 जून 2024 को CBI ने उन्हें जेल के अंदर ही औपचारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया। यानी जैसे ही एक दरवाज़ा खुलने की उम्मीद जगी, दूसरा दरवाज़ा पहले से बंद करने की तैयारी थी। मनीष सिसोदिया का मामला: यहां कहानी उलटे क्रम में चली। पहले CBI ने पूछताछ के बाद 26 फरवरी 2023 को सिसोदिया को गिरफ्तार किया। फिर जब वे CBI मामले में न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल में थे, तभी 9 मार्च 2023 को ED ने जेल के अंदर उनसे पूछताछ की और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में गिरफ्तार कर लिया। यानी किसी एक एजेंसी के मामले में ज़मानत मिलने से पहले ही दूसरी एजेंसी ने शिकंजा कस दिया। अब इन दोनों मामलों को आज़म खान के साथ जोड़कर देखिए, आपको पैटर्न खुद दिख जाएगा। आप कौन-से भाजपा के वोटर हैं, इतने तो पढ़े-लिखे होंगे ही। और यह मैं नहीं कह रहा, ओमप्रकाश राजभर कह रहे थे। मैंने तो बस उनकी बात यहां रख दी। तो अब समझ लीजिए कि काम किस तरह होता है। आज़म खान की मदद हनुमान बाबा करेंगे या नहीं, यह तो पता नहीं, लेकिन हनुमान जी और राम जी का नाम लेकर भाजपा अपनी मदद ज़रूर कर रही है। एक दिन ऐसा भी आएगा, जब भगवान ही सबका न्याय करेंगे।
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कल रामलीला मैदान: यह किसी पार्टी का नहीं, लोकतंत्र का मार्च है जब शरीर बीमार होता है, तो उसका इलाज किया जाता है, ताकि शरीर के सभी अंग और पूरा शरीर ठीक से काम कर सके। देश भी एक शरीर है, और इस देश के लोकतंत्र को कुछ कीड़े जकड़ रहे हैं। वे कीड़े लोकतंत्र को कमज़ोर करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि यह लोकतंत्र उनकी मुट्ठी में बंद हो जाए। लेकिन लोकतंत्र की परिभाषा तो यह थी कि वह जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए हो। यानी एक ऐसी प्रक्रिया, जिसमें लोग अपने ही बीच में से अपने नेता को चुनते हैं। अब अगर चुनने वालों को ही नियंत्रित किया जाने लगे, या पहले से तय कर दिया जाए कि कौन चुन सकता है और कौन नहीं, तो आपके बीच से चुना गया नेता भी आपका नहीं होगा। वह कुछ गिने-चुने लोगों का ही नेता होगा। कल, 1 नवंबर को रामलीला मैदान में जो मार्च हो रहा है, वह किसी पार्टी का मार्च नहीं है। यह न कांग्रेस का है, न भाजपा का, न RJD का, न ममता बनर्जी का। यह मार्च इस देश के लोकतंत्र को दुरुस्त करने का है। उस देश के लोकतंत्र को, जिसकी रगों में शुरुआत से लोकतंत्र बसा हुआ था। 25 जनवरी 1950 को, गणतंत्र दिवस से ठीक एक दिन पहले, देश में एक आयोग बना, जिसका नाम था चुनाव आयोग। संविधान के अनुच्छेद 324 में इसकी व्यवस्था की गई, ताकि यह पूरी तरह स्वतंत्र रहे। और ऐसा रहा भी। देश के पहले आम चुनाव से पहले मतदाता सूची तैयार करने में महीनों लगे। जिन लोगों के, खासकर लाखों महिलाओं के नाम ठीक से दर्ज नहीं हुए थे, उनकी प्रविष्टियां नहीं मानी गईं और उन्हें दोबारा नाम दर्ज कराने का मौका दिया गया, ताकि भारत का हर नागरिक वोट डाल सके। लेकिन ज्ञानेश कुमार ने वह करके दिखाया, जो इस देश के लोकतंत्र में आज तक कभी नहीं हुआ। लोगों के वोट कटते रहे, और उन्हीं राज्यों में चुनाव होते रहे। कुछ फॉर्म तक बदल दिए गए। आज बात किसी विचारधारा की नहीं हो रही, न किसी एक नियम-कानून की। बात इस देश की संस्थागत व्यवस्था की हो रही है। फॉर्म 6 और फॉर्म 7 बहुत दूर की बात है। फॉर्म 6 बदला जा सकता है या नहीं, यह बहुत ऊंचे दर्जे की बहस है। आप बस एक सवाल पूछिए: जब मतदाता सूची ठीक से तैयार ही नहीं हुई थी, तो उस राज्य में चुनाव कैसे करा दिया गया? जब पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री रहते देश का पहला लोकसभा चुनाव मतदाता सूची के लिए टाला जा सकता था, तो क्या राज्यों के विधानसभा चुनाव थोड़ी देर से नहीं हो सकते थे? इतनी जल्दबाज़ी में SIR करने की क्या ज़रूरत थी? और फिर, नियम यह है कि आयोग के फैसले बहुमत से लिए जाएंगे, लेकिन आप उसे भी नहीं मान रहे। जब आपसे सवाल पूछा जाता है, तो आप 26 सितंबर को प्रेस रिलीज़ जारी करके कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने इस पर मुहर लगाई है। और जब 5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट साफ कर देता है कि इसमें उसकी कोई भूमिका नहीं है, तो आप हलफनामे में कह देते हैं कि आपने तो कोई नियम बदला ही नहीं। तो कल सिर्फ यही सवाल लेकर पहुंचिए, और ज़रूर पहुंचिए। याद रखिए, आप इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को मज़बूत करने जा रहे हैं, किसी पार्टी को वोट देने नहीं। आप अपना वोट बचाने जा रहे हैं। जब वोट बचेगा, तभी आप तय कर पाएंगे कि कांग्रेस को वोट देना है या भाजपा को। और जब वोट ही नहीं रहेगा, तो आने वाले समय में न आप अपनी विचारधारा चुन पाएंगे, न अपनी सुरक्षा, न अपना नेता और न अपना काम। क्योंकि जिस व्यक्ति को चुनने में आपकी कोई भागीदारी नहीं होगी, वह कल आपके प्रति जवाबदेह भी नहीं होगा। यही तो लोकतंत्र की खूबसूरती है। जिस नेता को आपने वोट नहीं दिया, वह भी आपके प्रति जवाबदेह होता है। नेता चुनाव कुछ लोगों के वोट से जीतता है, लेकिन जवाबदेह पूरे निर्वाचन क्षेत्र के प्रति होता है। तो कल घर से निकलिए। अगर आप अपने राज्य से दिल्ली नहीं आ पा रहे हैं, तो अपने यहीं एक रामलीला मैदान बना दीजिए। सोशल मीडिया पर सवाल पूछिए, सरकार से, देश के प्रधानमंत्री से और सत्ताधारी दल भाजपा से, कि उसने अब तक बार-बार ज्ञानेश कुमार का बचाव क्यों किया? क्यों एक बार भी नहीं कहा कि ज्ञानेश कुमार जाकर जवाब दें? न सरकार ने, न राष्ट्रपति ने, एक बार भी ज्ञानेश कुमार से मिलकर इस बारे में जानने की कोशिश की। यही सवाल पूछिए। सवाल पूछने से पता चलता है कि आप ज़िंदा हैं। और अगर आप ज़िंदा हैं, तो शरीर के सभी अंगों को ठीक से काम करना चाहिए। शरीर के अंग तभी ठीक से काम करते हैं, जब समय-समय पर उनका इलाज, देखभाल और रखरखाव होता रहे। तो कल ज़िम्मेदारी है इस देश के लोकतंत्र के रखरखाव की, उसे बचाने की। जय हिंद, जय भारत, जय संविधान।
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सर ये कश्मीरी पंडितों को मरे थे या नहीं? मैनें सोचा पूछ लूं कुछ लोग आप की फिल्म देखने जाएंगे तो उनको पता रहेगा। किस नज़र से इनको देखना हैं।
Congratulations @OmarAbdullah. Keep shining. Keep smiling. Best. Always.
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जिस KFC का उद्घाटन किया था। उसमें हलाल चिकन आता है या झटका सर जी।
जो मॉक पार्लियामेंट आयोजित की गई थी, उसमें राहुल गांधी प्रधानमंत्री बने या नहीं?
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हनुमान बाबा मदद करेंगे, लेकिन एजेंसियां किसकी मदद कर रही हैं? अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया से लेकर आज़म खान तक केवल एक पैटर्न वह भी बीजेपी का "हनुमान बाबा मदद करेंगे।" यह नारा रामपुर में आज़म खान के समर्थन में लगा। अब हनुमान बाबा आज़म खान की मदद करेंगे या नहीं, यह तो पता नहीं। लेकिन इस देश की जांच एजेंसियां किसकी मदद करती हैं, यह समझना ज़्यादा मुश्किल नहीं है। सच कहूं तो मुझे इस देश की पुलिस से ज़्यादा भरोसा ED पर है। यह किसी भी आरोपी को छूटने ही नहीं देती। माफ कीजिएगा, किसी भी "विपक्षी" आरोपी को। और सबसे कमाल की बात यह है कि इसे कभी जल्दबाज़ी नहीं होती। जैसे ही अदालत किसी विपक्षी नेता को एक मामले में राहत देती है, एजेंसियां पहले से पूरी तैयारी करके बैठी होती हैं कि अब दूसरे मामले में गिरफ्तारी होगी। यकीन न हो, तो दिल्ली का ही ED और CBI का एक खेल याद कर लीजिए। आपको याद होगा कि ये एजेंसियां किस तरह काम करती हैं। बस इन मामलों को जोड़कर देखिए, सब समझ आ जाएगा। अरविंद केजरीवाल का मामला: ED ने 21 मार्च 2024 को केजरीवाल को उनके घर से गिरफ्तार किया। 20 जून 2024 को ट्रायल कोर्ट ने ED वाले मामले में उन्हें ज़मानत दे दी, जिस पर अगले ही दिन हाईकोर्ट ने रोक लगा दी। और फिर, जब केजरीवाल तिहाड़ जेल में ही बंद थे, तब 26 जून 2024 को CBI ने उन्हें जेल के अंदर ही औपचारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया। यानी जैसे ही एक दरवाज़ा खुलने की उम्मीद जगी, दूसरा दरवाज़ा पहले से बंद करने की तैयारी थी। मनीष सिसोदिया का मामला: यहां कहानी उलटे क्रम में चली। पहले CBI ने पूछताछ के बाद 26 फरवरी 2023 को सिसोदिया को गिरफ्तार किया। फिर जब वे CBI मामले में न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल में थे, तभी 9 मार्च 2023 को ED ने जेल के अंदर उनसे पूछताछ की और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में गिरफ्तार कर लिया। यानी किसी एक एजेंसी के मामले में ज़मानत मिलने से पहले ही दूसरी एजेंसी ने शिकंजा कस दिया। अब इन दोनों मामलों को आज़म खान के साथ जोड़कर देखिए, आपको पैटर्न खुद दिख जाएगा। आप कौन-से भाजपा के वोटर हैं, इतने तो पढ़े-लिखे होंगे ही। और यह मैं नहीं कह रहा, ओमप्रकाश राजभर कह रहे थे। मैंने तो बस उनकी बात यहां रख दी। तो अब समझ लीजिए कि काम किस तरह होता है। आज़म खान की मदद हनुमान बाबा करेंगे या नहीं, यह तो पता नहीं, लेकिन हनुमान जी और राम जी का नाम लेकर भाजपा अपनी मदद ज़रूर कर रही है। एक दिन ऐसा भी आएगा, जब भगवान ही सबका न्याय करेंगे।
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कल रामलीला मैदान: यह किसी पार्टी का नहीं, लोकतंत्र का मार्च है जब शरीर बीमार होता है, तो उसका इलाज किया जाता है, ताकि शरीर के सभी अंग और पूरा शरीर ठीक से काम कर सके। देश भी एक शरीर है, और इस देश के लोकतंत्र को कुछ कीड़े जकड़ रहे हैं। वे कीड़े लोकतंत्र को कमज़ोर करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि यह लोकतंत्र उनकी मुट्ठी में बंद हो जाए। लेकिन लोकतंत्र की परिभाषा तो यह थी कि वह जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए हो। यानी एक ऐसी प्रक्रिया, जिसमें लोग अपने ही बीच में से अपने नेता को चुनते हैं। अब अगर चुनने वालों को ही नियंत्रित किया जाने लगे, या पहले से तय कर दिया जाए कि कौन चुन सकता है और कौन नहीं, तो आपके बीच से चुना गया नेता भी आपका नहीं होगा। वह कुछ गिने-चुने लोगों का ही नेता होगा। कल, 1 नवंबर को रामलीला मैदान में जो मार्च हो रहा है, वह किसी पार्टी का मार्च नहीं है। यह न कांग्रेस का है, न भाजपा का, न RJD का, न ममता बनर्जी का। यह मार्च इस देश के लोकतंत्र को दुरुस्त करने का है। उस देश के लोकतंत्र को, जिसकी रगों में शुरुआत से लोकतंत्र बसा हुआ था। 25 जनवरी 1950 को, गणतंत्र दिवस से ठीक एक दिन पहले, देश में एक आयोग बना, जिसका नाम था चुनाव आयोग। संविधान के अनुच्छेद 324 में इसकी व्यवस्था की गई, ताकि यह पूरी तरह स्वतंत्र रहे। और ऐसा रहा भी। देश के पहले आम चुनाव से पहले मतदाता सूची तैयार करने में महीनों लगे। जिन लोगों के, खासकर लाखों महिलाओं के नाम ठीक से दर्ज नहीं हुए थे, उनकी प्रविष्टियां नहीं मानी गईं और उन्हें दोबारा नाम दर्ज कराने का मौका दिया गया, ताकि भारत का हर नागरिक वोट डाल सके। लेकिन ज्ञानेश कुमार ने वह करके दिखाया, जो इस देश के लोकतंत्र में आज तक कभी नहीं हुआ। लोगों के वोट कटते रहे, और उन्हीं राज्यों में चुनाव होते रहे। कुछ फॉर्म तक बदल दिए गए। आज बात किसी विचारधारा की नहीं हो रही, न किसी एक नियम-कानून की। बात इस देश की संस्थागत व्यवस्था की हो रही है। फॉर्म 6 और फॉर्म 7 बहुत दूर की बात है। फॉर्म 6 बदला जा सकता है या नहीं, यह बहुत ऊंचे दर्जे की बहस है। आप बस एक सवाल पूछिए: जब मतदाता सूची ठीक से तैयार ही नहीं हुई थी, तो उस राज्य में चुनाव कैसे करा दिया गया? जब पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री रहते देश का पहला लोकसभा चुनाव मतदाता सूची के लिए टाला जा सकता था, तो क्या राज्यों के विधानसभा चुनाव थोड़ी देर से नहीं हो सकते थे? इतनी जल्दबाज़ी में SIR करने की क्या ज़रूरत थी? और फिर, नियम यह है कि आयोग के फैसले बहुमत से लिए जाएंगे, लेकिन आप उसे भी नहीं मान रहे। जब आपसे सवाल पूछा जाता है, तो आप 26 सितंबर को प्रेस रिलीज़ जारी करके कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने इस पर मुहर लगाई है। और जब 5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट साफ कर देता है कि इसमें उसकी कोई भूमिका नहीं है, तो आप हलफनामे में कह देते हैं कि आपने तो कोई नियम बदला ही नहीं। तो कल सिर्फ यही सवाल लेकर पहुंचिए, और ज़रूर पहुंचिए। याद रखिए, आप इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को मज़बूत करने जा रहे हैं, किसी पार्टी को वोट देने नहीं। आप अपना वोट बचाने जा रहे हैं। जब वोट बचेगा, तभी आप तय कर पाएंगे कि कांग्रेस को वोट देना है या भाजपा को। और जब वोट ही नहीं रहेगा, तो आने वाले समय में न आप अपनी विचारधारा चुन पाएंगे, न अपनी सुरक्षा, न अपना नेता और न अपना काम। क्योंकि जिस व्यक्ति को चुनने में आपकी कोई भागीदारी नहीं होगी, वह कल आपके प्रति जवाबदेह भी नहीं होगा। यही तो लोकतंत्र की खूबसूरती है। जिस नेता को आपने वोट नहीं दिया, वह भी आपके प्रति जवाबदेह होता है। नेता चुनाव कुछ लोगों के वोट से जीतता है, लेकिन जवाबदेह पूरे निर्वाचन क्षेत्र के प्रति होता है। तो कल घर से निकलिए। अगर आप अपने राज्य से दिल्ली नहीं आ पा रहे हैं, तो अपने यहीं एक रामलीला मैदान बना दीजिए। सोशल मीडिया पर सवाल पूछिए, सरकार से, देश के प्रधानमंत्री से और सत्ताधारी दल भाजपा से, कि उसने अब तक बार-बार ज्ञानेश कुमार का बचाव क्यों किया? क्यों एक बार भी नहीं कहा कि ज्ञानेश कुमार जाकर जवाब दें? न सरकार ने, न राष्ट्रपति ने, एक बार भी ज्ञानेश कुमार से मिलकर इस बारे में जानने की कोशिश की। यही सवाल पूछिए। सवाल पूछने से पता चलता है कि आप ज़िंदा हैं। और अगर आप ज़िंदा हैं, तो शरीर के सभी अंगों को ठीक से काम करना चाहिए। शरीर के अंग तभी ठीक से काम करते हैं, जब समय-समय पर उनका इलाज, देखभाल और रखरखाव होता रहे। तो कल ज़िम्मेदारी है इस देश के लोकतंत्र के रखरखाव की, उसे बचाने की। जय हिंद, जय भारत, जय संविधान।
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"31 अक्टूबर की शाम… और एक चिट्ठी जो हवा के पते पर भेजी गई" प्रिय इंदिरा जी, आज 31 अक्टूबर है। बयालीस बरस हो गए, पर कैलेंडर का यह पन्ना आज भी सुबह की ओस की तरह भारी है। हर साल यह तारीख़ आती है और दरवाज़े पर चुपचाप खड़ी हो जाती है, लगता है कि जैसे कोई पुराना मेहमान जो दस्तक देने से पहले ही जानता हो कि भीतर क्या टूटा हुआ रखा है। सोचता हूँ, तुम्हें कहाँ से शुरू करूँ। इलाहाबाद के उस आनंद भवन से, जहाँ एक बच्ची ने दीवारों में इतिहास की साँसें सुनी थीं? या वो घर, जहां एक जलता हुआ चूल्हा था जिसमें देश की आज़ादी की रोटियाँ सिंकती थीं। उसी चूल्हे की आँच में तुम पकीं। बचपन तुम्हारे लिए खिलौनों के ज़्यादा, चिट्ठियों, गिरफ़्तारियों और अधूरी विदाइयों का मौसम था। तुमने बहुत जल्दी सीख लिया कि कुछ लोग पैदा होते हैं और कुछ लोग विरासत में एक बोझ पाते हैं, और बोझ कभी पूछकर कंधे नहीं चुनता। फिर वक़्त ने तुम्हें उस कुर्सी पर बिठाया जो काँटों का ताज थी। लोग तुम्हें "गूँगी गुड़िया" कहते थे। कितनी अजीब बात है, जिन्हें गुड़िया समझा गया, उन्होंने ही बाद में तूफ़ान की लगाम थामी। तुम वह चुप्पी निकलीं जो समंदर की सतह पर होती है, और नीचे पूरी धाराएँ करवट ले रही होती हैं। बैंकों का राष्ट्रीयकरण, हरित क्रांति की हरियाली, 1971 की वह फ़तह जब नक़्शे पर एक नया मुल्क उभरा, ये सब उसी चुप्पी के नीचे पलते इरादे थे, जो एक दिन लहर बनकर किनारों से टकराए। तुम्हारा व्यक्तित्व मुझे हमेशा एक पुराने क़िले जैसा लगा। ऊँची, मज़बूत, पथरीली दीवारें, जिन पर तोपों के निशान हैं, और भीतर एक सूना आँगन, जहाँ शाम होते ही अकेलापन पाँव पसारकर बैठ जाता है। सत्ता की ऊँचाई ऐसी ही होती है। जितना ऊपर चढ़ो, हवा उतनी पतली होती है और आवाज़ें उतनी दूर। तुम शिखर पर थीं, और शिखर पर सिर्फ़ बर्फ़ और हवा रहती है, हमसफ़र नहीं। और फिर आया वह दौर, जिसे याद करते हुए क़लम भी थोड़ी देर ठिठक जाती है। आपातकाल। एक ऐसी रात, जिसमें आज़ादी के दीये को हथेली की ओट में छिपाना पड़ा, या शायद बुझाना पड़ा। मैं इस पन्ने पर तुम्हें कटघरे में नहीं खड़ा करूँगा, इतिहास यह काम बरसों से कर रहा है और उसका फ़ैसला अब भी पूरी तरह लिखा नहीं गया। पर इतना ज़रूर कहूँगा कि वह दौर बताता है, सत्ता की रोशनी जब बेहिसाब हो जाए तो वह चौंधिया देती है, और चौंधियाई आँखें अपने ही पाँव के नीचे की ज़मीन भूल जाती हैं। लोकतंत्र एक नाज़ुक पौधा है। उसे धूप भी चाहिए, छाँव भी, और सबसे ज़्यादा चाहिए वह पानी जो असहमति की नदी से आता है। पर मज़ेदार है, उसी जनता ने, जिसने तुम्हें गिराया, कुछ बरस बाद तुम्हें फिर उठाया। देश का मन किसी तराज़ू का पलड़ा नहीं है कि एक बार झुका तो झुका रहे। वह मौसम की तरह है: बदलता है, माफ़ करता है, सवाल पूछता है, फिर लौट आता है। तुम्हारी वापसी इस बात का सबूत थी कि इस मिट्टी में हिसाब भी चलता है और हौसला भी। और फिर 31 अक्टूबर, 1984। वही सुबह, वही बगीचा, वही आँगन, जहाँ तुम रोज़ की तरह निकली थीं। कहते हैं, उस सुबह भी तुम्हारे क़दमों में घबराहट नहीं थी। जैसे कोई जानता हो कि पहाड़ को डर नहीं लगता, पहाड़ बस खड़ा रहता है, और जब गिरता है तो पूरी घाटी की गूँज बन जाता है। उस दिन भी यही हुआ। एक गोली की आवाज़ चली और उसकी गूँज कई बरस तक सड़कों, घरों और दिलों में भटकती रही। उस गूँज में सिर्फ़ तुम्हारे जाने का दुख नहीं था, उसके पीछे उठे धुएँ में कितने ही और घर जले, कितने ही और नाम बुझे। इतिहास का यह पन्ना दोहरा ज़ख़्म है: एक तुम्हारा, और एक उन बेगुनाहों का, जिनकी कोई पुण्यतिथि दीवार पर नहीं टँगती। इसलिए आज जब मैं तुम्हें याद करता हूँ, तो पूरे सच के साथ याद करना चाहता हूँ। न तो तुम्हें देवी बनाकर, न दानव बनाकर। इंसान बनाकर। एक ऐसी औरत जिसने साहस भी किया और भूलें भी, जिसने देश को ऊँचाइयाँ भी दिखाईं और अँधेरी गलियों में भी उतारा। जो अपने समय की सबसे रोशन मशाल भी थी और सबसे तपता हुआ सवाल भी। इतिहास किसी का सगा नहीं होता। वह एक नदी है जो हर किनारे को अपने ढंग से काटती है और अपने ढंग से सींचती है। तुम्हारे किनारे पर आज भी कुछ दीये जल रहे हैं, कुछ सवाल तैर रहे हैं। उस ख़ामोशी के नाम आज की शाम एक दीया मेरी ओर से भी। उसकी लौ न तो किसी पक्ष की है, न किसी विपक्ष की। वह बस इस बात की गवाही है कि कोई आया था, जिसने इस देश की धड़कनों में अपनी धड़कन मिलाई थी, और जिसके जाने के बयालीस बरस बाद भी यह तारीख़ हमें थोड़ा ठहरकर सोचने पर मजबूर कर देती है। अलविदा, इंदिरा जी। आपके नाम की यह चिट्ठी शायद किसी डाकघर तक कभी न पहुँचे, पर हवाओं के पते पर रवाना कर रहा हूँ। हवा कभी किसी की चिट्ठी खोती नहीं। खत लिखने वाला लड़का। चाय इश्क़ और राजनीति।
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🚨 10 लाख से अधिक लोग, एक आह्वान और एक मंज़िल – चलो दिल्ली! यह घोषणा देश के अलग-अलग राज्यों से दिल्ली पहुंचने की तैयारी कर रहे लोगों का एक बड़ा जुटान है। आयोजकों की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश से 1 लाख से अधिक, हरियाणा से 80 हजार से अधिक, कर्नाटक से 75 हजार से अधिक और मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र तथा तमिलनाडु से 50-50 हजार से अधिक लोगों के पहुंचने का दावा किया गया है। इसके अलावा केरल से 30 हजार, पंजाब से 25 हजार, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश से 15-15 हजार और उत्तराखंड से 10 हजार से अधिक लोगों के दिल्ली पहुंचने की तैयारी बताई गई है। 1 नवंबर 2026 को दिल्ली के रामलीला मैदान में प्रस्तावित 'चलो दिल्ली' मार्च के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से लोगों के जुटने का आह्वान किया गया है। इस आयोजन का केंद्रीय नारा है, 'वोट बचाओ, देश बचाओ'। अब सभी की निगाहें 1 नवंबर पर टिकी हैं। अलग-अलग राज्यों से आने वाले लोगों की भागीदारी और रामलीला मैदान में जुटने वाली भीड़ इस आयोजन का स्वरूप तय करेगी। चलो दिल्ली! वोट बचाओ, देश बचाओ!
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शैतान की सबसे बड़ी कामयाबी ये थी कि, उन्होंने यक़ीन दिलाया कि धरती पर भगवान है!
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आप एपस्टीन फाइल ढूंढते रह गए, उधर "पुरी" फाइल खुल गई आप सब एपस्टीन फाइल की बात करते रह गए, और उधर हरदीप पुरी राज्यसभा की कुर्सी पर फिर से जम गए। अब तो लोग मज़ाक में पूछने लगे हैं कि कहीं हरदीप पुरी के पास ही तो मोदी जी की "पूरी" फाइल नहीं है? जब उत्तर प्रदेश की राज्यसभा सूची आई और उसमें हरदीप पुरी का नाम नहीं था, तो राजनीतिक पंडित कहने लगे कि अब उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ेगा, क्योंकि वे सांसद ही नहीं रहेंगे। भाजपा कवर करने वाले एक पत्रकार बता रहे थे कि जब एपस्टीन फाइल का मामला सामने आया था, तब हरदीप पुरी ने खुद कहा था कि वे प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे, जबकि पार्टी चाहती थी कि मामला वह खुद संभाल ले। आखिरकार पुरी ने दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा कि वे एपस्टीन से कुछ मौकों पर मिले ज़रूर थे, लेकिन उनकी बातचीत का एपस्टीन के अपराधों से कोई लेना-देना नहीं था। लेकिन फिर क्या हुआ? अमेरिकी न्याय विभाग की ओर से जारी एक तस्वीर में हरदीप सिंह पुरी जेफ्री एपस्टीन के सामने एक मेज पर बैठे नज़र आए, और राहुल गांधी ने इस पर सवाल उठाया कि किस गद्दार को ब्लैकमेल किया जा रहा है। अब देखिए, जब उस व्यक्ति के साथ पूरी की पूरी तस्वीर ही सामने आ गई, तो सरकार सफाई देने के बजाय हरदीप पुरी को सम्मानित कर रही है और उन्हें मध्य प्रदेश से राज्यसभा भेज रही है। भाजपा ने हरदीप सिंह पुरी को मध्य प्रदेश की उस एकमात्र राज्यसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव के लिए उम्मीदवार बनाया है, जो केंद्रीय मंत्री एल. मुरुगन के इस्तीफे से खाली हुई है। मुरुगन अप्रैल 2024 में मध्य प्रदेश से राज्यसभा सदस्य चुने गए थे। 13-14 अक्टूबर 2026 को उन्होंने सूचना एवं प्रसारण और संसदीय कार्य राज्य मंत्री पद के साथ-साथ राज्यसभा सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया। बताया जा रहा है कि उन्होंने यह कदम तमिलनाडु में भाजपा संगठन को ज़मीनी स्तर पर मज़बूत करने और राज्य की राजनीति पर पूरा ध्यान देने के लिए उठाया। इस सीट के लिए चुनाव आयोग ने 12 नवंबर 2026 को उपचुनाव की घोषणा की है। सीट का कार्यकाल अप्रैल 2030 तक है, यानी चुनाव जीतने के बाद पुरी इसी बची हुई अवधि के लिए राज्यसभा में मध्य प्रदेश का प्रतिनिधित्व करेंगे। मध्य प्रदेश विधानसभा में भाजपा का साफ बहुमत है, इसलिए पुरी का निर्विरोध या आसानी से चुना जाना तय माना जा रहा है। यानी फाइल किसी की भी खुले, कुर्सी "पुरी" की ही बचेगी।
भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति ने मध्य प्रदेश में होने वाले राज्यसभा उप-चुनाव 2026 के लिए श्री @HardeepSPuri के नाम पर अपनी स्वीकृति प्रदान की है।
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चाय, इश्क और राजनीति। retweeted
प्रिय योगी जी, यह ओलंपिक की तैयारी नहीं है प्रिय योगी आदित्यनाथ जी @myogiadityanath . , मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश माननीय सांसद जितिन प्रसाद जी @JitinPrasada (पीलीभीत), माननीय विधायक विवेक कुमार वर्मा जी @vivekvermamla (बीसलपुर), और माननीय विधायक संजय सिंह गंगवार जी @SanjaySinghmla (पीलीभीत सदर), आप तो सरकार में मंत्री भी हैं। सच कहूं तो मुझे साफ तौर पर पता नहीं चल पा रहा कि यह गांव किस विधानसभा सीट में आता है। लेकिन काम नेक है, इसलिए सोचा कि आप दोनों ही यह नेक काम करना चाहेंगे। और अगर गांव आपकी सीट में न भी हो, तो कोई बात नहीं। आप दोनों एक ही दल में हैं, तो प्यार-प्यार में यह संदेश अपने मित्र तक पहुंचा ही देंगे। आखिर विकास ही तो होगा। किसी के लिए यह बस एक वीडियो होगा। आप इसे देखेंगे, थोड़ा बुरा लगेगा, और फिर अगले वीडियो पर स्क्रॉल कर देंगे। आखिर इससे बदल भी क्या जाएगा? यह पीलीभीत ज़िले का रामपुर अमृत गांव है। यहां नदी पार करने के लिए कोई पुल नहीं है। बस एक खंभा है, जिसे पानी के ऊपर रख दिया गया है। और उसी खंभे पर से बच्चे अपनी जान की बाज़ी लगाकर साइकिल पार कराते हैं, ताकि स्कूल पहुंच सकें। अगर इस गांव में दो दिन बिजली न आए, तो यही लोग बिजली विभाग का दफ्तर घेर लेंगे। इस गांव में कुछ नौजवान भी होंगे, जो शाम को खेलने और सुबह दौड़ लगाने जाते होंगे, ताकि आगे चलकर देश की सेवा कर सकें। लेकिन किसी के मन में एक बार भी नहीं आता कि पहले अपने गांव की, अपने गांव के बच्चों की सेवा कर ली जाए। और इस देश में सरकार और प्रशासन की आंखों का पानी तो कब का मर चुका है। नेता जी को बस अपने चुनाव की चिंता रहती है। वैसे घबराइए मत, सरकार। आने वाले समय में इस गांव के बच्चे ओलंपिक में मेडल ज़रूर लाएंगे। खंभे पर संतुलन बनाकर साइकिल पार कराना किसी खेल से कम है क्या? काश, यह ओलंपिक का खेल होता! तब मेडल सिर्फ रामपुर के बच्चे नहीं, देश के अनगिनत ऐसे गांवों और कस्बों के बच्चे जीतकर लाते, जहां आज भी पुल की जगह खंभे पड़े हैं। लेकिन सरकार को एक बार सोचना चाहिए कि कैसे एक बच्चा पुल न होने पर खंभे के सहारे साइकिल पार कर रहा है, ताकि स्कूल जाकर पढ़ सके। और बात सिर्फ स्कूल जाने तक की होती, तो समझ में आता। यहां तो बच्चे की ज़िंदगी दांव पर लगी है। और इस गांव में न जाने कितने लोग होंगे, जिनकी ज़िंदगी रोज़ इसी तरह दांव पर लगती होगी। आप अपने सोशल मीडिया पर दस जगह के कार्यक्रमों की तस्वीरें डालेंगे। चुनाव आने वाला है, तो हो सकता है दौरे भी लगें, फीते भी कटें। तो चुनाव से थोड़ा पहले, एक दौरा यहां का भी कर लीजिए। इतना फंड तो सांसद निधि और विधायक निधि में होगा ही कि एक पुल बनवाया जा सके। और अगर नहीं है, तो प्रधानमंत्री जी और मुख्यमंत्री जी को चिट्ठी लिखकर इसके लिए फंड का इंतज़ाम कीजिए। फिर भी न हो, तो देश में ऐसे बहुत से लोग हैं जो अच्छे कामों के लिए दिल खोलकर दान करना चाहते हैं। उन्हें आवाज़ दीजिए, बात उन तक पहुंच जाएगी। लेकिन कृपया बच्चों की ज़िंदगी से मत खेलिए। मैं "बच्चों के भविष्य से मत खेलिए" इसलिए नहीं लिख रहा, क्योंकि भविष्य तो तब बचेगा जब बच्चे ज़िंदा बचेंगे। जब बच्चा ही नहीं बचेगा, तो उसका भविष्य कहां से बचेगा? अगर यह संदेश आप तक पहुंच रहा है, तो मुझे उम्मीद है कि आपको इस गांव के बच्चों, बुज़ुर्गों और यहां की बुनियादी सुविधाओं की उतनी ही चिंता होगी, जितनी अपने बच्चों की होती है, जिन्हें आप पढ़ाना चाहते हैं, आगे बढ़ाना चाहते हैं। यह कोई ओलंपिक की तैयारी नहीं हो रही, कि आप खुश होकर कहें कि आने वाले समय में ये बच्चे मेडल जीतेंगे। फंड नहीं है, तो थोड़ा कुछ कीजिए। हमें उम्मीद है कि आप यह काम जल्दी करेंगे।
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प्रिय योगी जी, यह ओलंपिक की तैयारी नहीं है प्रिय योगी आदित्यनाथ जी @myogiadityanath . , मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश माननीय सांसद जितिन प्रसाद जी @JitinPrasada (पीलीभीत), माननीय विधायक विवेक कुमार वर्मा जी @vivekvermamla (बीसलपुर), और माननीय विधायक संजय सिंह गंगवार जी @SanjaySinghmla (पीलीभीत सदर), आप तो सरकार में मंत्री भी हैं। सच कहूं तो मुझे साफ तौर पर पता नहीं चल पा रहा कि यह गांव किस विधानसभा सीट में आता है। लेकिन काम नेक है, इसलिए सोचा कि आप दोनों ही यह नेक काम करना चाहेंगे। और अगर गांव आपकी सीट में न भी हो, तो कोई बात नहीं। आप दोनों एक ही दल में हैं, तो प्यार-प्यार में यह संदेश अपने मित्र तक पहुंचा ही देंगे। आखिर विकास ही तो होगा। किसी के लिए यह बस एक वीडियो होगा। आप इसे देखेंगे, थोड़ा बुरा लगेगा, और फिर अगले वीडियो पर स्क्रॉल कर देंगे। आखिर इससे बदल भी क्या जाएगा? यह पीलीभीत ज़िले का रामपुर अमृत गांव है। यहां नदी पार करने के लिए कोई पुल नहीं है। बस एक खंभा है, जिसे पानी के ऊपर रख दिया गया है। और उसी खंभे पर से बच्चे अपनी जान की बाज़ी लगाकर साइकिल पार कराते हैं, ताकि स्कूल पहुंच सकें। अगर इस गांव में दो दिन बिजली न आए, तो यही लोग बिजली विभाग का दफ्तर घेर लेंगे। इस गांव में कुछ नौजवान भी होंगे, जो शाम को खेलने और सुबह दौड़ लगाने जाते होंगे, ताकि आगे चलकर देश की सेवा कर सकें। लेकिन किसी के मन में एक बार भी नहीं आता कि पहले अपने गांव की, अपने गांव के बच्चों की सेवा कर ली जाए। और इस देश में सरकार और प्रशासन की आंखों का पानी तो कब का मर चुका है। नेता जी को बस अपने चुनाव की चिंता रहती है। वैसे घबराइए मत, सरकार। आने वाले समय में इस गांव के बच्चे ओलंपिक में मेडल ज़रूर लाएंगे। खंभे पर संतुलन बनाकर साइकिल पार कराना किसी खेल से कम है क्या? काश, यह ओलंपिक का खेल होता! तब मेडल सिर्फ रामपुर के बच्चे नहीं, देश के अनगिनत ऐसे गांवों और कस्बों के बच्चे जीतकर लाते, जहां आज भी पुल की जगह खंभे पड़े हैं। लेकिन सरकार को एक बार सोचना चाहिए कि कैसे एक बच्चा पुल न होने पर खंभे के सहारे साइकिल पार कर रहा है, ताकि स्कूल जाकर पढ़ सके। और बात सिर्फ स्कूल जाने तक की होती, तो समझ में आता। यहां तो बच्चे की ज़िंदगी दांव पर लगी है। और इस गांव में न जाने कितने लोग होंगे, जिनकी ज़िंदगी रोज़ इसी तरह दांव पर लगती होगी। आप अपने सोशल मीडिया पर दस जगह के कार्यक्रमों की तस्वीरें डालेंगे। चुनाव आने वाला है, तो हो सकता है दौरे भी लगें, फीते भी कटें। तो चुनाव से थोड़ा पहले, एक दौरा यहां का भी कर लीजिए। इतना फंड तो सांसद निधि और विधायक निधि में होगा ही कि एक पुल बनवाया जा सके। और अगर नहीं है, तो प्रधानमंत्री जी और मुख्यमंत्री जी को चिट्ठी लिखकर इसके लिए फंड का इंतज़ाम कीजिए। फिर भी न हो, तो देश में ऐसे बहुत से लोग हैं जो अच्छे कामों के लिए दिल खोलकर दान करना चाहते हैं। उन्हें आवाज़ दीजिए, बात उन तक पहुंच जाएगी। लेकिन कृपया बच्चों की ज़िंदगी से मत खेलिए। मैं "बच्चों के भविष्य से मत खेलिए" इसलिए नहीं लिख रहा, क्योंकि भविष्य तो तब बचेगा जब बच्चे ज़िंदा बचेंगे। जब बच्चा ही नहीं बचेगा, तो उसका भविष्य कहां से बचेगा? अगर यह संदेश आप तक पहुंच रहा है, तो मुझे उम्मीद है कि आपको इस गांव के बच्चों, बुज़ुर्गों और यहां की बुनियादी सुविधाओं की उतनी ही चिंता होगी, जितनी अपने बच्चों की होती है, जिन्हें आप पढ़ाना चाहते हैं, आगे बढ़ाना चाहते हैं। यह कोई ओलंपिक की तैयारी नहीं हो रही, कि आप खुश होकर कहें कि आने वाले समय में ये बच्चे मेडल जीतेंगे। फंड नहीं है, तो थोड़ा कुछ कीजिए। हमें उम्मीद है कि आप यह काम जल्दी करेंगे।
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