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मेरी ये पुस्तक "एक नौकरीपेशा की डायरी" अमेजन किंडल एप पर उपलब्ध है।
किसी भी स्मार्टफोन पर अमेज़न किंडल एप आसानी से डाउनलोड करके पढ़ सकते हैं।
amzn.in/d/2EthFTF
वाल्मीकि रामायण निष्पक्ष व्यक्ति के भाव से लिखी गई है और तुलसी दास की रामचरित मानस दास्य भाव से।
शायद बाकी की रामायण भी भक्ति भाव से लिखी गईं।
लेकिन इस सबके बावजूद अगर आपने वाल्मीकि रामायण पूरी पढ़ी है तो भी आपको अनुभूति होगी कि भगवान राम की कुछ कमी या रणनीतिक चतुरता (बाली वध)दिखाने के बावजूद उनका चित्रण तत्कालीन सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति के रूप में ही हुआ है।
वाल्मीकि रामायण पूरे ग्रंथ में एक अजीब सी सकारात्मकता है जो ऋषियों यज्ञों प्रकृति का गुणगान करती है, युद्ध को श्रेष्ठ बताती है, छद्म अहिंसा का प्रतिकार करती है जहां स्त्री राक्षसी को मारने में संकोच नहीं और
साथ ही असली पुरुषार्थ जहां वर्जित विषयों के कारण समाज से बाहर अहिल्या को समाज में सम्मान दिलाने वाला महान कार्य।
ये राम अंत्यज जाति के निषादराज गुह के मित्र हैं और शबरी के स्नेही।
ये वानरों भालुओं के साथ सहज हैं। जिनके लिए वशिष्ठ और विश्वामित्र ही नहीं अगस्त्य भी गुरु हैं और अपने किये किसी काम के लिये वो स्पष्ट हैं। बहाने नहीं खोजते।
वहीं रावण का चरित्र पूर्ण खल चरित्र है जो कामी क्रोधी अहंकारी है और रामचरित मानस कि तरह वो राम को भगवान नहीं मानता।
और रावण के शिवभक्त होने का उल्लेख भी युद्ध कांड तक तो कहीं आया भी नहीं।
वाल्मीकि रामायण सारी रामायण का मूल है और रामचरित मानस से काफी अलग है।
अब ये कह सकते हैं कि मूल मानी जाने वाली वाल्मीकि रामायण के भी कई वर्जन हैं।
लेकिन कई शोधकर्ता ये बात लिख चुके हैं कि अयोध्या कांड से युद्ध कांड तक ही रामायण की मूल कथा है।
और उन्नीस बीस इन कांडों में किसी भी वाल्मीकि रामायण में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है।
कोई अगर ये कहता है कि वाल्मीकि रामायण रामचरित मानस की तरह धर्मग्रंथ नहीं है , साहित्यिक ग्रन्थ है
तो मैं पूछना चाहूंगा कि आदित्य हृदय स्तोत्र, वशिष्ठ विश्वामित्र अगस्त्य जैसे ऋग्वेद के ऋषियों का वर्णन, यज्ञ को प्रधान बताने वाला वाल्मीकि रामायण अगर हमारा धर्मग्रन्थ नहीं तो है क्या?
और धर्मग्रंथों पर फिल्में धर्मग्रन्थों जैसी ही बननी चाहिये, हैरी पॉटर या गेम ऑफ थ्रोन्स जैसी नहीं।
यहाँ कोई बेवकूफ नहीं कि समझ न पाये कि किसी एप के इंस्टॉल करने और उसपर स्क्रीन टाइम देने से किसी निजी व्यक्ति को फायदा होता है।
igot कर्मयोगी के वीडियो कोर्स किये बिना अब उन बेचारे शिक्षामित्रों और पंचायत सहायकों रोजगार सेवकों तक को भी सरकारी मानदेय नहीं मिलता जिनके पुराने देय ही रुके रहते हैं।
बाकी शायद ही कोई सरकारी विभाग की वेतन हर महीने कम से कम इसका दो से पांच कोर्स किये बिना पास होता हो।
मैं बार बार कहता हूँ कि मैंने 2011 की बसपा सरकार का वो रूप बड़े करीब से देखा है जब आई ए एस अफसरान सरकार चला रहे थे, मुख्यमंत्री पता नहीं किस दुनिया में थी।
काश्तकार परेशान थे, भ्रष्टाचार चरम पर था और छोटे सरकारी कर्मचारी ऐसे उत्पीड़ित कि एक रूटीन ट्रांसफर की फाइल भी मुख्यमंत्री कार्यालय से पास होती थी ।
कैसे? ये समझदार लोग समझते हैं।
हर चीज़ की कट मनी तय थी।
और इन सब चीजों का दोबारा अनुभव हो रहा है।
पाकिस्तानी ड्रामे अभी तक नहीं देखे पर पहला चाइनीज ड्रामा माई गर्लफ्रेंड इज़ एन एलियन और दूसरा पुट योर हेड ऑन माई शोल्डर देखा और ये दोनों अभी भी मेरे रिपीट वॉच हैं।
एक ताईवानी ड्रामा है जिस पर सारे पूर्व एशियाई देशों में रीमेक बना है।
ओरिजनल ताईवानी ड्रामे का नाम फेटेड टु लव यू है और बाकी हर भाषा में
यू आर माई डेस्टिनी।
हीरोइन के पेट में हीरो के बच्चे के कारण दोनों का प्यार बढ़ना शादी करना और बच्चा गिरने के बाद दोनों का तलाक लेना और फिर लौट के मिलना।
मुझे नहीं पता कि इस तरह की ज़बर्दस्त थीम पर आज तक कोई हिंदी सीरियल या वेबसीरीज या फिल्म क्यों न बनी।
Ishq Murshid ये Love story मुझे पसन्द आ रही है। किसी ने ये ड्रामा रिकमेंड किया था और शॉर्ट्स, रील्स आदि देखा था पहले ही तो बेहतर लगे थे।
एक दिन इसके चार एपिसोड्स देखा था फिर कल रात को 16 एपिसोड एक बार में ही देख डाला। यक़ीन मानिये रात को 11 बजे के बाद देखना शुरू किया और बंध गया फिर अगले दिन की सुबह 7 बजे तक देखता ही रह गया।
डॉयलॉग्स अच्छे हैं, कहानी सिम्पल है लेकिन सधी और बंधी हुई है, एक्टिंग और सुंदरता दोनों ही बेहतरीन है.. कुल मिलाकर देखने लायक है।
पाकिस्तानी ड्रामा है तो देखना न देखना आपकी मर्ज़ी है। जब युद्ध चल रहा था तो मैंने भी वहाँ के हर एक चीज़ का विरोध ही कर दिया था। फिर यहाँ की सरकार ने युद्ध के बाद वहाँ के सब अनब्लॉक कर दिए तो हमने भी सोचा कि जब ads आदि भारतीय ही हैं तो हम देख भी लेंगें तो इसमें हमारे देश का कोई नुक़सान तो है नहीं।
वैसे पाकिस्तानी ड्रामा सच में बड़े प्यारे और बेहतरीन बनाये जा रहे हैं, हमारे देश में tv सीरियल्स बहुत लंबा खींच दिए जाते हैं जो कि अच्छी बात नहीं है।
सिर्फ जंग के मैदानों में लड़ने वाले ही असली मर्द नहीं होते।
दीवाली पर टांड से लेकर स्टोर रूम और बाथरूम से लेकर सीवर तक की सफाई करने वाले भी असली मर्द होते हैं।
पर अफसोस कि इनकी वीरगाथाओं का जिक्र नहीं होता।
फिल्मी कहानियां, रोमांटिक उपन्यास और रोमियो जूलियर के नाटक पढ़ के बुद्धि खराब करने वाली प्रजाति असली प्रेम नहीं समझ पाती जो ज्यादातर पति पत्नी में ही हो पाता है।
वो भी बच्चे पैदा होने के बाद।
आज मार्किट में दो तीन जगह किसी न किसी अलग अलग जगह किसी न किसी पिता को अपने किशोरवय बेटों बेटियों को शॉपिंग करवाते हंसते खेलते झगड़ा झिकझिक करते (ये बेटियां ही करती हैं बाप से) देखा।
जब बच्चों की माएं उनके सात नहीं थीं।
ये एक अद्भुत तरह का सुख है।
हम लोगो के बचपन में शायद ही पंद्रह सोलह के होने के बाद पिता जी लोग शॉपिंग में साथ जाते थे।
ये अद्भुत सुख केवल भारतीय पारिवारिक व्यक्ति ही समझ सकते हैं जिन्हें अपनी पत्नी बच्चों घर परिवार से प्यार हो कि अपने बच्चों के साथ लड़ते झगड़ते शॉपिंग करने में क्या मजा आती है जब बेटी बाप को डांट रही हो कि रात में आइसक्रीम मत खाओ, मम्मी को बता दूंगी।
भाई बहन से कह रहा हो कि काली ड्रेस में तुम और काली लगोगी।
बाप बेटे को फटकार रहा हो कि चुपचाप फॉर्मल व्हाइट शर्ट खरीद, ये दूसरी वाली नहीं चलेगी।
भाई बहन दुकान के अंदर झगड़ जाएं और बाप दुकान के बाहर चुपचाप गोलगप्पे खा रहा हो कि बच्चे न देख लें।
ये अद्भुत और प्यारे दृश्य होते हैं जो दीपावली जैसे पर्व पर किसी भी शहर में अक्सर देखने को मिल जाते हैं।
लेकिन इस सबके होने दिखने के लिये क्या जरूरी है?
मार्केट?
नहीं!
त्यौहार?
नहीं!
परिवार?
हां!
परिवार जरूरी है जो एक स्त्री और एक पुरुष मिल के बनाते हैं।
इसी हिंदू भारतीय परिवार नाम की संस्था को बहुत से लोग तोड़ने में जुटे रहते हैं।
और हर त्यौहार पर यही हिंदू भारतीय परिवार ऐसे लोगों को उनकी औकात बताते निकल जाते हैं।
गोलगप्पा खाते हुये।
कभी कभी आइस्क्रीम भी।
यूपी के धरातल का माहौल समझना है तो केवल खाद देने वाली सोसायटी के एक चक्कर लगा लें।
बहुतों के बहुत से भरम दूर हो जायेंगे।
एक बात तो स्पष्ट है कि यूपी चुनाव को लेकर यूपी वाले भाजपाई भी उदासीन हैं ।
और मुखर कौन हैं , बिहार वाले, mp वाले, गुजरात वाले, महाराष्ट वाले , राजस्थान वाले ।
जानते हो क्यों ??
क्योंकि यूपी वाले माहौल की जमीनी हकीकत देख रहे हैं ,
यूपी वाले इस सरकार की भी धरातल पर सच्चाई देख रहे हैं ,
इसलिए वो खामोश हैं क्योंकि अंदर से दिल गवाही नहीं दे रहा जिससे उनके अंदर जोश आ सके और वो उसी तरह से पार्टी के लिए समर्पित हो जाएं जैसे 2014 से लेकर 2019 तक हुआ करते थे ।
2022 के चुनाव में अंत में जाकर अधूरे मन से समर्थन कर दिए थे ।
लेकिन अब तो एकदम से निराश हो चुके हैं ।
खैर अन्य राज्य वाले , इस बार यूपी में आकर भाजपा को चुनाव जिताएंगे ।














