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एक बार किसी ने योगीराज देवरहा बाबा जी से पूछा मन्दिर कौन बनवाएगा, देवरहा बाबा ने अशोक सिंघल जी को दिखा कर कहा, यही बनवाएंगे।
हिन्दू हृदय सम्राट श्री अशोक सिंघल जी की जन्म शताब्दी पर शत-शत नमन
@MuditUpdates
दीपावली पर पटाखे जलाना पूर्णतः शास्त्रसम्मत है। उल्कादान से ही यह अत्यंत विकसित अवस्था में पहुंच गया है। आश्विन कृष्णपक्ष से ही यमलोक से पितृ छूटकर वंशजों के द्वार पर 15 दिन श्राद्ध की प्रतीक्षा करते हैं, महालय अमावस्या तक। तब भी श्राद्ध नहीं मिलता तो एक महीना और कार्त्तिक अमावस्या तक प्रतीक्षा करते हैं।
अतः दीपावली को श्राद्ध अवश्य किया जाता है। इस दिन सब पितृ पुनः पितृलोक की ओर प्रस्थान करते हैं। तब उन्हें मार्ग दिखाने के लिए हाथों में फुलझड़ी और ऐसे पटाखे जिनसे प्रकाश ऊपर की ओर जाता हो, उन्हें दिखाकर उनका मार्गदर्शन कर पितरों को विदा किया जाता है। यह उल्कादान सब शास्त्रों में वर्णित है। आकाश में जिसे तारे टूटना कहते हैं उसे उल्का कहते हैं, यह आतिशबाजी ही उल्का दान कहलाती है जो दीपावली पर कृत्य कर्म है। यह उल्कादान ही भव्य आतिशबाजी के रूप में विकसित हुआ है। प्राचीनकाल से ही हम दीपावली पर पटाखे चलाते आए हैं। इस बार दो फुलझड़ी आकाश की ओर दिखाकर अपने पितरों का स्मरण करें और उल्कादान करें।
तुलासंस्थे सहस्रांशो प्रदोषे भूतदर्शयोः।
उल्काहस्ता नराः कुर्युः पितृणां मार्गदर्शनम्॥
― @MuditUpdates
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This 6kka generation does not burst firecrackers. Gen Z and Gen Alpha. A lot of my favourite childhood memories as a little boy was walking around like a commando with a bag full of explosives especially blowing up that green bomb. Diwali should sound like AKs going off for 5 days. It did until a decade ago.
संसार में दीपावली से बड़ा पर्व नहीं है, इसमें छोटे छोटे इतने महत्त्वपूर्ण कृत्य हैं कि उन्हें करने पर मनुष्य का सब प्रकार से मङ्गल होता है। ये कृत्य वैदिक ऋषियों की कुटियाओं से सीधे लाखों करोड़ों वर्षों बाद भी चले आ रहे हैं, चाहे धन्वंतरि पूजन हो, स्वर्ण रजत का क्रय विक्रय हो, स्वच्छता व सुंदरता का चहुंओर अभियान हो, यम को दीपदान हो, नरक को दीपदान हो, सिर पर अपामार्ग का भ्रम हो, अभ्यंग स्नान हो, सायं पितरों के मार्गदर्शन को उल्कादान हो, अमावस्या को दर्श श्राद्ध हो, माता महालक्ष्मी की पूजा हो, साथ में श्रीगणेश विराजे हों, तड़के पूर्व ही दरिद्रता निवारण हो, गोवर्धन पूजन हो, अन्नकूट महोत्सव हो, यमद्वितीया भाईदूज हो। समस्त तंत्रों का मिला जुला निचोड़ दीपावली में ही है। समस्त साल भर का सार दीपावली में ही है। दीपावली समस्त मंगलों का मूल है। यह समस्त स्वस्ति का सूत्र है। समस्त शुभों की शोभा है। समस्त लाभों का लय है। दीपावली दीपों की पंक्ति है जो पितरों को पितृलोक पहुंचाती है, भक्तों के समस्त लोक प्रशस्त करती है और मुनियों को ब्रह्मलोक की ओर ले जाती है। दीपावली के रहस्य अगाध अनन्त अज्ञेय व अपरिमित हैं। धर्मशास्त्र के अनुसार उन कृत्यों को अवश्य करना चाहिए। जो सक्षम हैं उन्हें दिन रात जागकर श्रीसूक्त, लक्ष्मीसूक्त आदि जप करना चाहिए। जो ऐसा करता है वह भगवती का प्रिय पुत्र होता है। जय माँ लक्ष्मी
@MuditUpdates
◆ नरक चतुर्दशी का कृत्य
नरक चतुर्दशी को नरक निमित्त चतुर्मुख दीपदान
चार मुँह का दीपक नरक के उद्देश्य से दान करे।
पूर्वाभिमुख होकर दीप की पूजा कर दीपदान करे।
दत्तो दीपश्चतुर्दश्यां नरकप्रीतये मया।
चतुर्वर्तिसमायुक्तः सर्वपापापनुत्तये॥
ध्यान दें यम निमित्त दीपदान धनत्रयोदशी को प्रदोष काल में हो चुका है, वह एक बत्ती वाला है। नरक निमित्त दीपदान चार बत्ती वाला है, वह नरक चतुर्दशी को होगा। परन्तु यम तर्पण इसी दिन होगा और प्रातः पूर्वाह्न में ही होगा, प्रदोष में नरक दीपदान होगा। अब आगे नरक चतुर्दशी का कृत्य देखें,
◆ लिङ्गपुराण में माषपत्र शाक का विधान
माषपत्रस्य शाकेन भुक्त्वा तत्र दिने नरः।
प्रेताख्यायां चतुर्दश्यां सर्वपापैः प्रमुच्यते॥
प्रेत चतुर्दशी अर्थात् नरक चतुर्दशी के दिन जो मनुष्य उड़द के पत्तों से बने शाक का भोजन करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। यह लिङ्गपुराण में वर्णित है।
◆ नरक चतुर्दशी को यमतर्पण की अनिवार्यता
दीपोत्सवचतुर्दश्यां कार्यं तु यमतर्पणम्॥
दीपोत्सव की चतुर्दशी के दिन यमराज के निमित्त तर्पण अवश्य करना चाहिए।
◆ अपामार्ग द्वारा शिरोभ्रमण और यमतर्पण
अपामार्गस्य पत्राणि भ्रामयेच्छिरसोपरि।
ततश्च तर्पणं कार्यं धर्मराजस्य नामभिः॥
नरक चतुर्दशी के दिन अपामार्ग अर्थात् चिरचिटा के पत्तों को अपने सिर के ऊपर घुमाना चाहिए। इसके पश्चात् धर्मराज यम के विभिन्न नामों का उच्चारण करते हुए उनका तर्पण करना चाहिए।
◆ यमराज के चौदह नाम
यमाय धर्मराजाय मृत्यवे चान्तकाय च।
वैवस्वताय कालाय सर्वभूतक्षयाय च॥
औदुम्बराय दध्नाय नीलाय परमेष्ठिने।
वृकोदराय चित्राय चित्रगुप्ताय वै नमः॥
यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतक्षय, औदुम्बर, दध्न, नील, परमेष्ठी, वृकोदर, चित्र और चित्रगुप्त, इन चौदह नामों वाले यमराज को नमस्कार है।
◆ हेमाद्रि में तर्पण की विधि और फल
एकैकेन तिलमिश्रान् दद्याच्च त्रीन् जलाञ्जलीन्।
संवत्सरकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति॥
यमराज के प्रत्येक नाम का उच्चारण करते हुए तिलमिश्रित जल की तीन तीन अञ्जलियाँ अर्पित करे। ऐसा करने से वर्षभर में किए हुए पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं।
दक्षिणाभिमुखो भूत्वा तिलैः सव्यं समाहितः।
देवतीर्थेन देवत्वात्तिलैः प्रेताधिपो यतः॥
दक्षिण दिशा की ओर मुख करके, सव्य अवस्था में तिलयुक्त जल से यमराज का देवतीर्थ से तर्पण करे।
यज्ञोपवीतिना कार्यं प्राचीनावीतिना तथा॥
यमतर्पण यज्ञोपवीती अथवा प्राचीनावीती दोनों अवस्था में किया जाता है। यहां देवकार्य होने से ऐसे एक एक नाम बोलकर के सव्य होकर देवतीर्थ से करे।
ॐ यमाय नमः ॥३॥
ॐ धर्मराजाय नमः ॥३॥
ॐ मृत्यवे नमः ॥३॥
ॐ अन्तकाय नमः ॥३॥
ॐ वैवस्वताय नमः ॥३॥
ॐ कालाय नमः ॥३॥
ॐ सर्वभूतक्षयाय नमः ॥३॥
ॐ औदुम्बराय नमः ॥३॥
ॐ दध्नाय नमः ॥३॥
ॐ नीलाय नमः ॥३॥
ॐ परमेष्ठिने नमः ॥३॥
ॐ वृकोदराय नमः ॥३॥
ॐ चित्राय नमः ॥३॥
ॐ चित्रगुप्ताय नमः ॥३॥
◆ जीवित पिता वाले भी नरक चतुर्दशी को करें यमतर्पण
जीवत्पितापि कुर्वीत तर्पणं यमभीष्मयोः॥
जिस व्यक्ति के पिता जीवित हैं, उसे भी यमराज तथा भीष्म पितामह का तर्पण करना चाहिए।
कार्त्तिक अमावस्या दीपावली को अब अभ्यंग होगा, प्रातःकाल अपामार्ग का शिरोभ्रमण तो उस दिन भी होगा।
----- @MuditUpdates
ॐ मृत्युना दण्डपाशाभ्यां कालेन च मया सह।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां नमः ।।
धन त्रयोदशी को यम निमित्त प्रदोषकालीन दीपदान
आज एक किलो का अखबार आया है, 3 पूरे पूरे अखबार दैनिक भास्कर के। अखबार वाले ने सूतली से बांधकर अखबार बालकनी में फेंका है। भला हो किसी के कांच वांच पर न लगा हो! अखबार में 90% एड भरे पड़े हैं, बीच बीच में 3-4 खबरें हैं। 😂
धनतेरस का सम्बंध धन से ही है, क्योंकि इस दिन ही समुद्र मंथन से चतुर्दश रत्न प्रकट हुए थे। भगवान धन्वंतरि भी इसी दिन प्रकट हुए थे इसलिए स्वास्थ्य से भी सम्बन्ध है। परन्तु धन से सम्बन्ध नहीं है यह कहना गलत है। अतः मांगलिक वस्तुएं सोना चांदी रत्न आदि धनतेरस को खरीदना अत्यंत शुभ है।
@MuditUpdates
लेख एवं शोध-पत्र आमंत्रण
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‘महाराजा भोज विशेषांक’
विषय : भारतीय ज्ञान-परम्परा, साहित्य, विज्ञान, स्थापत्य एवं सांस्कृतिक वैभव के अप्रतिम उन्नायक महाराजा भोज पर मौलिक लेख एवं शोध-पत्र आमंत्रित।
महोदय/महोदया,
सादर नमस्कार!
भारतीय इतिहास में महाराजा भोज का व्यक्तित्व एक विद्वान्-शासक, महान् योद्धा, साहित्यकार, कला-संस्कृति के संरक्षक तथा ज्ञान-साधना के उन्नायक के रूप में विशिष्ट स्थान रखता है। उनके जीवन और कृतित्व में शासन-कौशल, शौर्य, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, स्थापत्य और लोककल्याण का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। परमार राजवंश के इस यशस्वी शासक की बहुआयामी विरासत भारतीय सभ्यता की बौद्धिक समृद्धि और सृजनशीलता की महत्त्वपूर्ण परिचायक है।
नव वर्ष चेतना समिति की वार्षिक पत्रिका ‘नव चैतन्य’ का आगामी अंक ‘महाराजा भोज विशेषांक’ के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है। इस विशेषांक का उद्देश्य महाराजा भोज के जीवन, व्यक्तित्व एवं कृतित्व का प्रामाणिक, शोधपरक और बहुआयामी मूल्यांकन प्रस्तुत करना है। हमारा प्रयास केवल उनके यशोगान तक सीमित न रहकर ऐतिहासिक स्रोतों, अभिलेखों, पाण्डुलिपियों, पुरातात्त्विक साक्ष्यों और आधुनिक अनुसंधान के आलोक में उनकी उपलब्धियों तथा वैचारिक अवदान का वस्तुनिष्ठ विवेचन करना है।
महाराजा भोज से सम्बद्ध ‘समराङ्गणसूत्रधार’, ‘युक्तिकल्पतरु’, ‘सरस्वतीकण्ठाभरणम्’, ‘शृङ्गारप्रकाश’, ‘शृङ्गारमञ्जरीकथा’ तथा ‘तत्त्वप्रकाश’ जैसी कृतियाँ स्थापत्य, तकनीकी चिन्तन, साहित्य, काव्यशास्त्र और दर्शन सहित विविध ज्ञानक्षेत्रों में उनके व्यापक बौद्धिक सरोकारों की परिचायक हैं। भोजपुर का भोजेश्वर महादेव मन्दिर, धार की भोजशाला तथा भोज से सम्बद्ध जल-संरचनाएँ उनकी स्थापत्य-दृष्टि, सांस्कृतिक विरासत और लोककल्याणकारी परम्परा के अध्ययन के महत्त्वपूर्ण आधार हैं। इनसे जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों, प्रचलित मान्यताओं और उपलब्ध साक्ष्यों का आलोचनात्मक परीक्षण विशेषांक को विशिष्ट अकादमिक महत्त्व प्रदान करेगा।
विशेषांक में धार की भोजशाला, सरस्वती अथवा वाग्देवी की प्रतिमा, उनसे सम्बद्ध अभिलेखीय एवं पुरातात्त्विक साक्ष्य तथा इस विषय से जुड़े समकालीन ऐतिहासिक और विधिक विमर्श को भी समुचित स्थान दिया जाएगा।
इस महत्त्वपूर्ण बौद्धिक पहल के लिए इतिहासकारों, पुरातत्त्ववेत्ताओं, संस्कृतज्ञों, साहित्यकारों, दार्शनिकों, वैज्ञानिकों, कला-मर्मज्ञों, शिक्षाविदों तथा स्वतंत्र शोधकर्ताओं से महाराजा भोज के जीवन, युग, कृतित्व और विरासत से सम्बन्धित मौलिक लेख एवं शोध-पत्र आमन्त्रित हैं।
सम्पादक मण्डल
नववर्ष चेतना समिति लखनऊ
( लेख भेजने के लिए सम्पर्क करें, @MuditUpdates - सह सम्पादक )
ईरान, ईराक, इजराइल, रूस, यूक्रेन, अमेरिका, हूती, इनके बम मिसाइल मिलकर भी पर्यावरण का कुछ नहीं उखाड़ पाए तो आपके सूतली बम से कुछ नहीं होने वाला। दीपावली पर पर्यावरण का ज्ञान देने वालों को जमके पेलिए और पटाखे फोड़िए।
मूर्तिपूजा और बहुदेववाद के विरुद्ध अधर्मियों को सबसे अधिक कुतर्क किसने मुहैया कराये?
आर्य समाज ने!
महर्षि का उद्देश्य भले पवित्र रहा हो पर उन्होंने जाने - अनजाने अधर्मियों को ऐसे - ऐसे कुर्तक प्रदान कर दिए, जिसे लेकर मिर्ज़ा गुलाम अहमद कादियानी से लेकर ज़ाकिर नाइक तक ने मतांतरण की विशाल पौध खड़ी कर दी।
यही गलती बलराम जी के लिए बोलकर मोरारी बापू ने की थी और अब यही धीरेंद्र शास्त्री जी कर रहे हैं।
बंद कमरे में, अपने अनुयायियों के बीच आप चाहे जो बोलें पर वही बात भले अच्छी भावना से कही गई हो, उसे आप पब्लिकली बोलते हैं तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है, वो भी उस हिन्दू समाज में जहां दोष - दर्शन की प्रवृति इतनी अधिक है कि ये समाज आपके हजार सत्कर्मों की बलि आपकी एक अनजानी गलती या अपनी बात न समझा पाने के चलते ले लेगा।
मैं स्वयं हिन्दू समाज की इस प्रवृति का भुक्तभोगी हूँ।
खैर, मैं तो कुछ भी नहीं हूँ। क्योंकि, ये वही समाज है, जो गांधी जी की हत्या के पश्चात पूज्य गुरुजी गोलवलकर को मारने के लिए आ गई थी। ये वही समाज है जिसने स्वातंत्र्य वीर सावरकर की भाई की लिचिंग की थी।
आचार्य धीरेन्द्र शास्त्री की आयु कम है, बड़बोले हैं तो भावावेश में कुछ आगे निकल गए..... क्षमा याचना कर ली है तो समाज को इस बात से आगे निकलना चाहिए और शास्त्री जी को चाहिए कि हिन्दू समाज का प्रबोधन करने निकले हैं, तो इस समाज की मनोवृत्ति और मनोविज्ञान का पूरा अध्ययन करके निकलें।
दूसरी बात, हम कुछ भी ऐसा न करें हो दूसरों को मजा लेने का मौका दे।
– अभिजीत सिंह जी
@MuditUpdates
चातुर्मास में कौनसा विवाह मुहूर्त्त होता है? देवोत्थान एकादशी से विवाह मुहूर्त्त खुलते हैं। अभी कोई मुहूर्त्त नहीं है कम से कम क्षत्रियों में तो चातुर्मास में विवाह की कोई परम्परा नहीं रही है। विवाह वेदविरोधी मत में करने के साथ ही शुद्ध मुहूर्त्त आदि सनातन शिष्टचार का भी त्याग कर दिया।
Prime Minister Narendra Modi attended the wedding reception of Rajkumar Martand Singh, son of Yuvraj Vikramaditya Singh and Yuvrani Chitrangada Raje, and grandson of Dr. Karan Singh and Rhea Badal, daughter of former Punjab Finance Minister Manpreet Singh Badal and Sardarni Vinu Badal, in New Delhi on Tuesday.
@vikramaditya_JK @Martand_JK
संघ को समझने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा लिखित पुस्तक "ज्योतिपुंज" एक अद्वितीय पुस्तक है। इसमें प्रधानमंत्री जी ने स्वामी विवेकानंद, परमपूजनीय डॉक्टर साहब, परमपूजनीय श्रीगुरुजी से लेकर वकील साहब आदि संघ के महान प्रचारकों जिन्होंने राष्ट्रकार्य में अपना तिल तिल गला दिया, उनकी जीवन गाथा लिखी है। मोदी जी ने संघ से सम्बंधित दो पुस्तकें लिखी हैं, एक ज्योतिपुंज, दूसरी सेतुबंध, दोनों ही अद्वितीय हैं, मोदी जी के राष्ट्रीय विचार इनमें निबद्ध हैं।
ज्योतिपुंज के लोकार्पण के इसी कार्यक्रम में ही 14 अप्रैल 2008 को साध्वी ऋतम्भरा जी के अपने सम्बोधन में श्री नरेन्द्र मोदी जी को भविष्य का राष्ट्रनायक बता दिया था। उन्होंने इस कार्यक्रम में स्पष्ट कहा था कि संघ प्रचारक नरेन्द्र मोदी जी राष्ट्र का अग्रणी नेतृत्व करेंगे और रामजन्मभूमि समेत अपने सभी लक्ष्यों को प्राप्त कर हिन्दू समाज गौरव का अनुभव करेगा, जबकि उस समय मोदी जी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और राष्ट्रीय राजनीति में बहुत दूर तक नहीं थे। उस समय की गई साध्वी ऋतम्भरा जी की यह भविष्यवाणी अक्षरशः सत्य साबित हुई थी।
जय श्री राम
@MuditUpdates @narendramodi @DidiRitambhara
पहले ऐसी बेतुकी कहानियां अखबारों के मधुरिमा, परिवारीय, रविवारीय जैसे अंकों में या मैगजीनों में छपती थीं, पर उनका नाम कहानी ही होता था। आजकल उन कहानियों को अपने जीवन की बताकर X पर छापा जाता है लोगों की भावनाओं को भूनकर monetization के लिए। ऐसी फर्जी कहानियां पढ़ पढ़कर जल्दी ही लोग ऊब जाएंगे।
मेरे बड़े भाई के घर छोड़कर चले जाने के दस साल बाद भी, पिताजी हर शाम मुख्य दरवाज़े का ताला खुला रखते थे।
घर के बाकी लोग मान चुके थे कि भैया अब कभी वापस नहीं आएँगे, लेकिन पिताजी रात के दो बजे भी उठकर बरामदे की बत्ती जला देते थे।
जिस दिन पिताजी का देहांत हुआ, उनकी पुरानी मेज़ की दराज साफ करते समय मुझे एक भारी-भरकम डायरी मिली।
डायरी के पन्नों के बीच एक पीला पड़ चुका लिफाफा दबा हुआ था। उस पर भैया का नाम लिखा था।
मुझे लगा, शायद यह पिताजी का आखिरी ख़त होगा, जिसमें उन्होंने भैया से लौट आने की मिन्नतें की होंगी।
अगले दिन भैया दस साल बाद पिताजी के अंतिम संस्कार में शामिल होने घर लौटे।
मैंने चुपचाप वह लिफाफा उनके हाथ में थमा दिया।
लेकिन लिफाफा देखते ही उनके चेहरे का रंग उड़ गया। उन्होंने उसे खोला तक नहीं।
बस कांपती आवाज़ में कहा—
"जरा इसे पलटकर देखो... इसके पीछे किस बैंक की मुहर लगी है।"
मैंने जैसे ही लिफाफा पलटा, उस पर शहर के सबसे पुराने सहकारी बैंक की सील और एक तारीख दिखाई दी।
वह तारीख वही थी, जिस रात भैया घर छोड़कर गए थे।
मैंने हैरानी से पूछा, "आखिर इस बैंक की मुहर का तुम्हारे घर छोड़ने से क्या रिश्ता है?"
भैया ने दीवार का सहारा लिया और जो सच बताया, उसे सुनकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई....1/2
























