तिम्रा प्रत्येक शव्दहरूसँग असहमती, तिम्रो बोल्ने एकाधिकारको अन्तसम्म प्रतिवाद!

Joined July 2024
Spot on! This stems from cultural poverty, a declining education system that kills critical thinking and whimsical leadership driven by cheap viral populism rather than core values. We are replacing serious policy, structural and livelihood issues with mere social media noise.
Nepal is doomed to find sense in what is obviously nonsense, either to prevent further collective decline or out of our characteristic sycophancy.
1
1
5
430
आनुवंशिकीको नियम अनुसार मानिसको डीएनएबाट शारीरिक बनावट, आँखा र कपालको रङ एवं केही हदसम्म वंशानुगत स्वास्थ्य अवस्था हस्तान्तरण हुन्छ। व्यक्तिको आर्जित ज्ञान र बौद्धिक सीप डीएनएमा अभिलेखित हुन्न। यसलाई बिम्बकै रूपमा प्रयोग गर्नु पनि वंशवादी चिन्तनलाई अनभिज्ञतामै प्रश्रय दिनु हो।
हमालको लागि कूटनीति वाग्लेको जस्तो अनुमानको कुरा होइन । उनको DNA मै कूटनीति छ। धेरै समय विभिन्न देशका नेपाली दूतावासमा बिताएका छन्।
1
4
282
नेपालमा आमरूपमा बिक्री हुने अती नाम चलेका समेत अन्य अधिकांश 'इनर्जी ड्रिङ्कहरू'मा विश्व स्वास्थ्य संगठनले निर्धारण गरेको दैनिक सुरक्षित मापदण्ड भन्दा बढी चिनी पाइएको विभिन्न अध्ययनले देखाएका छन्।
कुटनैतिक चेत त कडै हो चिनीको चेत चाहि अलि पुगेको भए तोर्पे टाइगर बिज्ञापन खेल्न पर्थेन । राइस दाइ ले । CC @kewalpb @Prashant68
1
1
102
Timely perspective. While 'strategic castling' offers tactical agility in a volatile global order, Nepal’s core foreign policy must remain anchored in calculated neutrality. Our sovereign choices should be dictated by our own economic priorities, not external pressures.
In a changing international environment, concepts such as strategic castling may gain currency,requiring nations to reposition their diplomatic assets & relationships to safeguard vital national interests, preserve strategic autonomy, and reduce multiple sources of vulnerability.
5
139
ठेगाना हराएर एक अँगालो अँध्यारा रातहरू डाकघरको चिसो छिंडीमा तिमीले पठाएको कमनीय प्रेमपत्रसँगै बसेका छन् कैद न तिमी खोज्न आउँछ्यौ न म नै भेट्न पाउँछु ठिक त्यसैगरी हराएको थियो कतै हाम्रो गन्तव्यको नाम पनि जसरी अनायासै नाम निशाना मेटियो सुन्धाराबाट सदर डाकघरको
1
7
173
Formal academic credentials should not be conflated with cognitive capacity, as the possession of an advanced degree does not preclude an individual from demonstrating a profound lack of critical judgment or intellectual competence.
“विद्वान” हुँदैमा “बुद्धिमान” चैं नहुने रेछन्! मनुवाहरू!!
2
1
1
3
268
केवल किरण retweeted
“विद्वान” हुँदैमा “बुद्धिमान” चैं नहुने रेछन्! मनुवाहरू!!
23
29
14
238
15,534
Exactly! 'Delivery' has just become a trendy political jargon. What started as a promise has officially turned into linguistic sophistry, leaving citizens with nothing but systemic delays and disappointment.
In Nepal, “delivery” has become so overused that it’s almost hackneyed. Old or new, the political class tosses it around at the drop of a hat. But what does it actually mean for the people? What began as rhetoric is beginning to sound like sophistry. 🫤
3
78
This data from the World Bank is not based on facts. The World Bank itself relies on data from the NSO. No one who possesses the academic capacity to handle statistics and standard applications speaks out against World Bank. This might come as an even greater surprise to you.
I am always surprised how no one pushes back against this. Nepal's own NLSS puts poverty at 20%, which is 10X higher than the WB number of 2.4%. This 10X difference for the same metric would be unacceptable in any other field, yet people share this w/o a second thought.
2
74
केवल किरण retweeted
I am always surprised how no one pushes back against this. Nepal's own NLSS puts poverty at 20%, which is 10X higher than the WB number of 2.4%. This 10X difference for the same metric would be unacceptable in any other field, yet people share this w/o a second thought.
Nepal reduced extreme poverty almost as fast as China. It did not have much FDI, manufacturing, the agricultural share of the economy remained high, and there was an active civil conflict. How did Nepal do it? Migration, largely to the Gulf: indevelopmentmag.substack.co…
3
5
3
51
4,205
पृथ्वीनारायण शाहले काठमाडौं उपत्यकाका तीनै वटा राज्यहरू जितिसकेपछि वि.सं. १८२६ चैत १० गते काठमाडौंलाई एकीकृत नेपालको राजधानी घोषणा गरे। त्यस दिन देखि आजसम्म पनि नेपाल देश भन्नाले लगभग काठमाडौं मात्रै नै हो भन्ने बुझिने र राजकीय सेवाहरु समेत यहीं केन्द्रित गरिने चाहिँ किन होला हँ?
देश भनेको काठमाडौं हो ३५ बर्ष पहिले पनि ६ महिना देखि पनि ।। कर फेरि काठमाडौं बाहिर पनि उठाउछन चमेली । CC @ashish_gajurel
1
3
270
म भनें स्टीफन जुइगको द वर्ल्ड अफ यस्टर्डेको चेतावनीमा अड्किएँः सभ्यता जतिसुकै भव्य भए पनि यो सजिलै भत्किन सक्छ। पेरिस, मिलान र तिरानाका बलिरहेका सडकहरूले त्यो अनुपम यूरोपेली वैभवको अप्रिय क्षयीकरणलाई उदांगो पारेको छ। कारणहरू सबैतिर एकै छन्- सत्ता र नागरिकको दैनन्दिन भन्दा टाढा छ।
डोमिनिक ल्यापिएर र ल्यारी कोलिन्सले १९६५ मा अघिसारेको प्रश्न Is Paris Burning ? ( खासमा पुस्तक) अहिले बढी सान्दर्भिक लाग्न थाल्यो। दोस्रो विश्वयुद्ध ताका समेत जोगिएको पेरिस जलाउने अहिलेको शक्ति हिटलर भन्दा पनि शक्तिशाली हुनुपर्छ !
3
137
अगर ख़ामोश रहोगे तो बात कौन करेगा, हुक़ूमतें तो यहाँ गूँगे लोग चाहती हैं।
राष्ट्रहरू प्रायः बाहिरी शत्रुले मात्र असफल बनाउँदैनन्। कहिलेकाहीँ तिनको क्षय भित्रैबाट सुरू हुन्छ; जब नेता आफूलाई प्रश्नभन्दा माथि ठान्छ, जब बौद्धिक समाज सोच्न छोड्छ, जब संस्थाहरू व्यक्तिको इच्छामा चल्न थाल्छन् र जब नागरिकले सत्तालाई प्रश्न गर्न छोड्छन्। setopati.com/opinion/401023
60
वो लोग जिन्होंने हमेशा गलत राह पर चलने का जोखिम उठाया वो लोग जिन्होंने गलत लोगों पर भरोसा किया वो जिन्होंने चोट खाई, धोखा खाया, ठोकर खाई गिरे और धूल झाड़कर खड़े हुए वे कहां जाएंगे ?
हारे हुए लोगों के लिए कौन दुनिया बसाएगा ? उन पराजित योद्धाओं के लिए , तमाम शिकस्त खाए लोगों के लिए। प्रेम में टूटे हुए लोग, सारी जिंदगी को कहीं दांव लगाकर हारे हुए लोग थके-हारे लोग, गुमनाम लोग वो बूढ़े पिता जो अब अकेले रह गए हैं वो कल्पनाओं में खोया रहने वाला बच्चा जो परीक्षा में फेल हो गया है वो लड़की जो तेज कदमों से घर की तरफ लौट रही है वो बूढ़ा गुब्बारे वाला जो कांपते हाथों से पैसे गिनता है एक असफल लेखक मैच हार गया खिलाड़ी इंटरव्यू से वापस लौटा युवा और ऐसे तमाम लोग जिन्हें पता था कि वे सफल हो सकते हैं मगर उन्होंने असफलताओं से भरा रास्ता चुना, वो लोग जिन्होंने हमेशा गलत राह पर चलने का जोखिम उठाया वो लोग जिन्होंने गलत लोगों पर भरोसा किया वो जिन्होंने चोट खाई, धोखा खाया, ठोकर खाई गिरे और धूल झाड़कर खड़े हुए वे कहां जाएंगे ? क्या कोई ऐसी दुनिया होगी जहां दो हारे हुए इंसान एक-दूसरे की हथेलियां थामे कई पलों तक खामोश रह सकते हों अपनी चुप्पी में तकलीफ बांटते हुए। जिन्होंने इकारस की तरह सूरज की तरफ उड़ान भरी और उनके पंख पिघल गए हारे हुए लोगों के लिए कोई जगह नहीं है न किसी घर में, न समाज में, न किसी देश में। क्या जो विजेता थे वो इनसे बेहतर हैं? बेहतर थे? नहीं, वही हारा जिसने जिंदगी की अनिश्चितता पर यकीन किया वही जिसने अनजान रास्तों पर चलने का जोखिम उठाया जिसने गलती करनी चाही , जो मक्कार चुप्पियों के पीछे छिपा नहीं। जो बोल सकता था मगर बोला नहीं उसने वो चुना जिसे चुनने का कोई तर्क नहीं था सिवाय उसकी आत्मा के जो हारा आखिर वो भी एक नायक था। एक पराजित नायक के दर्द को कौन समझना चाहेगा? जाएंगे कहाँ सूझता नहीं चल पड़े मगर रास्ता नहीं क्या तलाश है कुछ पता नहीं बुन रहे हैं दिल ख़्वाब दम-ब-दम ~ दिनेश श्रीनेत 🌸🩶
1
51
राज्यका नीतिहरू तृणमूलको यथार्थबाट टाढिँदा र सबै सत्ता अन्तरनिहित चरित्रमा रमाउँदा वैश्विक युवा भविष्य असुरक्षित भयो। शासनहरू नागरिकको दैनन्दिन, आर्थिक कठिनाई र भावनाबाट धेरै पर छन्। त्यसैले अब आक्रोशको सस्तो लोकप्रियतावाद होइन तृणमूल तह केन्द्रित आशाको ठोस राजनीतिको विकल्प छैन।
किशोर र कनिष्ठ युवाहरु संसार भरि सडकमा निस्किएनका छन।धेरै ठाउँको स्थिति हेर्दा यो तहको उपद्रो जायज देखिन्न।के यी अपरिभाषित विद्रोहहरुको कारण कठोर तानाशाहीकरणको खाका तयार हुदै त छैन विश्वमा?
1
87
एक से एक जुड़कर दो होते है ये गणित कहता है एक से जुड़कर ग्यारह होना संगठन होता है।
2
102
1
585
19,116
बेताब है इस जहां की हर शय कहते हैं जिसे सुकून, नहीं है रहते हैं सितम-कश-ए-सफ़र सब— तारे, इंसां, शजर, हज़र सब ~अल्लामा इक़बाल 'सुकूँ-ओ-सिबात'
बेताब है इस जहां की हर शय…
1
1
2
135
केवल किरण retweeted
बेहतर समाज के निर्माण में शिक्षा और स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण योगदान होता है। —जाँ द्रेज़
8
383
3
1,290
14,223
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता -निदा फ़ाज़ली
Today is the birthday of one of my favourites, Nida Fazli Sahab... His writing simplifies complex emotions... Just so good... घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए!
1
4
129
"गिरो गिरो, लेकिन गिरो तो उस झरने की तरह... जो पर्वत की ऊँचाई से गिरकर भी अपनी सुन्दरता खोने नहीं देता... ज़मीन के तह से मिलकर भी अपने अस्तित्व को नष्ट नहीं होने देता।" ~हृदय लानी
देहत्याग गर्नुभन्दा २९ वर्षअघि नाना पाटेकरले 'यशवन्त' नामक फिल्ममा आफ्नै भाषामा भनेका थिए, "उचाइबाट त्यसरी झर, जसरी झरना झर्छ । पर्वतको शिखरबाट झर्दा पनि उसले आफ्नो सौन्दर्य गुमाउँदैन ।" नाना पाटेकरले असोज २२ मा देह त्याग गरेकै दिन पूर्वराष्ट्रपति विद्या भण्डारी पनि पर्वतको शिखरबाट झरिन् र सोझै केपी ओलीको पाउमा बजारिइन् । उनी झरना होइन, लेदो मिसिएको बाढी जस्तै देखिइन् । त्यो पर्दैनथ्यो विद्या !
1
78